देखो देखो हँसे ना जमाना: मेरी डेमोक्रेसी कहाँ गई?(Look, Look, the World Is Laughing: Where Did My Democracy Go?)


मेरी डेमोक्रेसी कहाँ गई पर राजनीतिक व्यंग्य की तस्वीर
सांकेतिक एवं व्यंग्यात्मक चित्रण (Satirical Illustration)
             

मेरी डेमोक्रेसी कहाँ गई?

मैं ढूंढता था जिसको रातों के अंधियारों में वो मुझ को मिल सकी ना सुबह की उजियारों में। ऊं हुं! गलत मत सोचना। मैं अपनी "डेमो" मतलब "डेमोक्रेसी" की बात कर रहा हूं! पिछले 12 सालों से वो कुछ उखड़ी उखड़ी रहती थी अब अचानक गायब ही हो गई। परेशान हूं कि जाने कहाँ मेरी 'डेमो" गई जी अभी अभी इधर थी किधर गई जी। अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है तेल बचाने की बात हो रही थी पता नहीं दिये जलाने में ना खर्च हो गई हो। हाय, 1947 से साथी मुझे भूल न जाना, देखो देखो हँसे ना जमाना, हँसे ना जमाना!

करें तो क्या करें!  जा डेमोक्रेसी को ढूंढ। 

"ऐ दिल तोड़ने वाले , तुझे दिल ढूंढ रहा है।"

चुनाव आयोग पहुँचा फकीरा

अरे फकीरा सिर्फ गाना गाने से नहीं होगा सड़क पर आना होगा। डेमोक्रेसी की जान तो चुनाव में बसती है जा पहले चुनाव आयोग में जा, वहां देख।

अच्छा !सुन कर तेरी पुकार संग चलने को लो फकीरा है तैयार। 

 सुनिये! डिंग डिंग जरा सुनिये ना!

 चुनाव कुमार जी, मेरी "डेमोक्रेसी" आपके यहां है क्या? 

अरे क्या कहते हैं भई वो तो पहले के चुनाव आयुक्त के समय से मशीन के झटके और extra 2ab की मार से परेशान थी और मैंने वोटर एडिशन और डिलीशन का खेल को  SIR नाम दे पुनः क्या शुरू किया वो बिल्कुल हत्थे से ही उखड़ पता नहीं कहां चली गई। 

सर, आपने ये काम किया ही क्यों? 

क्या कहते हो भाई ! करना पड़ता है! जिस विश्वास के साथ मुझे इस कुर्सी पर बैठाया गया तो उसे मै कैसे तोड़ दूं? 

अभी तक 13 करोड़  जिंदा वोटर्स का राजनीतिक संहार  कर चुका हूं। बिहार और बंगाल  मैंने ही जीत कर दी है। पूरे देश जीतने अभी बाकि ही हैं। बहुत काम करने पड़ते हैं ।

देखो ना, पूर्व चीफ जस्टिस , दिल्ली की वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्री,  वर्तमान विदेशमंत्री, एल के आडवाणी और सीनियर वकील श्री कपिल सिब्बल जैसों की नागरिकता संदिग्ध बना दिया  है।

कमाल तो देख 2003 के ड्राफ्ट लिस्ट में मेरा और मेरे बाप के नाम भी  नहीं था फिर भी खुद को घुस पैठिया होने से बचा लिया है।

किन्तु लूटमार जी , ये SIR तो  "डेमोक्रेसी" के साथ  सरासर धोखा है।

वो सब मैं कुछ नहीं जानता।  2047 तक की गारंटी जो ली है उसके पुख्ता इंतजाम भी तो करने हैं? हद करते हो!

संसद से भी रूठी डेमोक्रेसी 

सचमुच हद तो हो गई ! अपनी "डेमो" यहां चुनाव  आयोग में ही नहीं मिली तो और कहां मिलेगी? चलो देखते हैं कहीं खुद की बहन संसद के पास तो नहीं चली गई। 

" बहन संसद "

  "डेमो" आपके यहां है ?

थी तो भैया पर अब नहीं रही ।

 मतलब, हुआ क्या ?

अरे भैया क्या ही बताये?  विपक्ष के सवाल का जवाब देने मेरे यहां ना तो शक्तिमान आये और न ही उनके बाहुबली मंत्री। उनमें हिम्मत की कमी रही और इधर विपक्ष  वॉक आउट मोड में रहा। बिन चर्चा के दनादन विधेयक पास होते रहे । विपक्ष चीखता रहा सत्तापक्ष वंदे मातरम करती रही।

ये बात बहन "डेमो" को पसंद नहीं आई और रूठ कर पता नहीं कहां चली गई।

लोककल्याण मार्ग पर डेमोक्रेसी की तलाश

यहां नहीं है तो कहां ढूंढू?

अरे देख लो कहीं वो अपने मुंहबोले भाई "लोककल्याण" के पास न चली  गई हो।

वही लोककल्याण जो लोक कल्याण मार्ग में  रहते हैं जिनपर पर देश के कल्याण की जिम्मेवारी है ? 

अरे हां वही! बहन संसद बोली।

वही  लोककल्याण जो शक्तिमान भी हैं और जो शक्तिमान है वही गंगाधर है मतलब गंगाधर ही शक्तिमान है।

हां हां वही! आवाज जरा तेज थी।

चलो उससे से ही पूछते हैं।

ओ भैया शक्तिमान!  क्या "डेमो"आपके पास आई?

नहीं तो। वो तो मेरे पास से कब की चली गई।

भला क्यों?

अरे क्या बताऊं ,उसे मेरी आदतें और मित्रकल्याण में लगे रहना दोनों ही पसंद नहीं थी। देखो ना अमेरिकन मित्र के कल्याण के लिए UPI पर टैक्स लगाया वो बात भी तुम्हारी "डेमो"  कहीं होगी उसे यह भी अच्छी नहीं लग रही होगी।

मित्र कल्याण तो समझा! नाम लिया तो मुसीबत मोल लूंगा पर आदतें ऐसी कौन सी थी जो "डेमो" को पसंद नहीं थी।

अरे वही डींगे मारना, झूठ बोलना, हिंदू-मुस्लिम करना, प्रेस कॉन्फ्रेंस ना करना, शिकायत ,आलोचना  और विरोध करने वाले की ऐसी तैसी कर देना ये सब बहन डेमोक्रेसी को पसंद न था। 

पर गंगाधर भाई, आप ये सब करते ही क्यों हो?

आदत से मजबूर हूं भाई, 

शाखा ने यही तो सिखाई।

संविधान के रक्षक से डेमोक्रेसी का सवाल

यहां भी "डेमो" नहीं है। समझ में नहीं आता उसे अब कहां ढूंढा जाय। याद आया उसका एक और रक्षक भाई और भी है चलें  वहां देखते हैं।

संविधान की रक्षा का भार इसी रक्षक पर  है। डेमोक्रेसी और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की रक्षा करना भी इसका ही काम है।

हे संविधान रक्षक जी, क्या आपने मेरी 'डेमो' को देखा है?

कौन "डेमो'' अच्छा वो  डेमोक्रेसी! क्या हुआ उसे?

वो मिल नहीं रही है पता नहीं कहां चली गई?

मुझसे अब क्यों पूछते हो जब मैने 2018 के प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही कह दिया था कि डेमोक्रेसी खतरे में है फिर भी 2019  में तुमने खतरे को ही चुन लिया।

अरे क्या करें सर, बालाकोट के बम धमाके में आपकी बात फकीरे को ठीक से सुनाई नहीं दी थी।

पर रक्षक जी आपका काम खतरे की सूचना भर देना भर नहीं था बल्कि खतरे से रक्षा करना भी तो था ?

जस्टिस मुरलीधर समझे हो क्या? डेमोक्रेसी की रक्षा करने में लगे रहते तो यहां के बदले प्रयागराज ही पहुंच जाते? यहां कई  काम हैं ,समस्याएं हैं। पेगासस है और अपने भविष्य के प्रति कुछ आशाएं है।

इसके अलावे  बैडमिंटन खेलने विदेश भी तो जाना पड़ जाता है। उफ्फ! मेंटल के साथ फिजिकल लोड भी लेने पड़ते हैं।

इतना बिजी होने के बाद भी फटकार लगाते रहते हैं। देखते नहीं SIR पर जनता के हक में खूबसूरत फटकार लगा रहे हैं यहां तक कई बार इसे खत्म करने की धमकी भी दी। फटकार ही काफी है।

क्या चाहते हो जनहित में  SIR रद्द कर  दें। भविष्य की फिक्र क्या सिर्फ तुम्हें ही होती है ? चल निकल !

साधु बाबा ने खोली फकीरा की आंखे

इधर चला मैं उधर चला, न जाने मै किधर चला, 

फिसल गया  ,"डेमो" ये तूने क्या किया।

उफ्फ ! कोई चमत्कार ही हो जाता? स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने जिस तरह स्वामी विवेकानंद की ईश्वर दर्शन की जिज्ञासा शांत कर दी थी वैसे ही कोई इस फकीरे को "डेमो" का दर्शन करा देता तो दिल को तसल्ली मिलती।

अलख निरंजन! अलख निरंजन! 

चमत्कारजी, अरे नहीं  ! 

साधु बाबा आ गए, साधु बाबा आ गए।

बाबा, बाबा देखो ना मेरी "डेमो" कहीं खो गई मिल ही नहीं रही।

 अब फिक्र न कर !

अगर तेरा प्रेम है सच्चा, 

डेमोनिया मिलेगी बच्चा।

बाबा! बाबा! डेमोनिया नहीं डेमोक्रेसी।

अरे हां वही तेरी डेमोक्रेसी! उसे ऑटोक्रेसी ने अपदस्थ कर दिया है। वह अभी अहिंसक  गुरिल्ला वार में लगी हुई है इसलिए तुझे दिख नहीं रही है।यदि तुम्हें उसे देखना है तो हर उस मंच की ओर देख जहां सत्ता से सवाल पूछे जा रहे हैं। 

जंतर मंतर के कॉकरोच आंदोलन और छात्रों की गूंज में वह दिखी होगी। देश में सत्ता विरोध के हर उस अहिंसक आंदोलनों में देख वहां तुम्हारी डेमोक्रेसी दिखेगी।

Indian  Express 23 सितंबर 26 के उस पन्ने में जहां ऑटोक्रेसी की चुनाव घोटाले को उजागर करने वाली सच्ची पत्रकारिता की गई है  वहां भी देख तुम्हारी डेमो झाँक रही है । 

बाबा! बाबा! आपने तो मेरी आंखें ही खोल दी ! मुझे अपनी डेमो दिख रही है।

दिख रही है तो जा उसका साथ दे और मिल कर लड़ । पर बापू की बात याद रखना अहिंसा परमोधर्म । हिंसा डरपोकों का हथियार है और तू मार खाने से भले ही डरता है पर हिंसा करने वाला डरपोक नहीं है।

थैंक यू बाबा! याद रखूंगा।

लिये सपने निगाहों में, चला हूं तेरी राहों में, 

डेमो आ रहा हूं मैं।

फकीरे को उसकी डेमो मिल गई।

अंत भला तो सब भला। जन से तंत्र मिल गए।

"मिल गए मिल गए मेरे सनम

आज मेरे जमीन पर नहीं है कदम।।"

जय हिंद।

अस्वीकरण :  यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और विश्लेषणात्मक है तथा इसमें किया गया व्यंग्य विषय को सरल और रोचक बनाने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या राष्ट्र की मानहानि करना नहीं है।

 

 

















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