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| सांकेतिक एवं व्यंग्यात्मक चित्रण (Satirical Illustration) |
"कर्म किए जा, फल की की चिन्ता मत कर ए इंसान ,जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान!" द्वापर युग में दिया गया दिव्य गीताई ज्ञान अंधभक्ति के इस "आफत काल" में भी इतना एफेक्टिव होगा ऐसा ना तो चंपत राय ने सोचा था और ना ही ज्ञानेश कुमार ने! यही कारण है मंदिर में चंदा चोरी के बाद अब चुनावों में वोट चोरी भी पकड़ ली गई है।
कथित Non biological के आशीर्वाद से भय रहित हो इन दोनों ने अपने - अपने काम को बखूबी अंजाम दिया।एक ने ट्रस्ट के महासचिव पद पर बैठ राम मंदिर के करोड़ों के चढ़ावे की चोरी होने दी तो दूसरे ने मुख्य चुनाव आयुक्त बन 13 करोड़ लोगों के वोट गायब कर अपने आका की ताबड़तोड़ जीत सुनिश्चित कर डेमोक्रेसी की छुट्टी ही कर दी।
परन्तु लाख टके का सवाल था कि जिस राम के नाम पर कई चुनाव लड़े और जीते गए बावजूद उस भगवान राम तक को धोखा दिया गया उन्हें भला राम ऐसे ही कैसे छोड़ देते?
अस्तु चंपत राय बदनामी की गठरी सहित मंदिर ट्रस्ट से गायब कर दिए गए वहीं गुप्ता ज्ञानेश की चुनाव आयोग से छुट्टी होने ही वाली है और जेल के दरवाजे भी खुल गए हैं। इतना ही नहीं इन दोनों नियुक्त करने वाले शक्तिमान की खुद की कुर्सी भी बुरी तरह हिल गई है।
यह बदलाव अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति और संसद द्वारा कानून में संशोधन किए बिना किया गया था। इसलिए ये बदलाव अवैध था ।
कमाल!
धत्! और कितने कमाल ?
कमाल तो ये था कि चुनाव आयोग ने अपने प्रेस नोट में दावा कर दिया इस बदलाव को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी प्राप्त है।
केचुआ( केंद्रीय चुनाव आयोग) का सुप्रीम कोर्ट को लेकर ये कॉन्फिडेंस हैरत में डालने वाला है।
खैर सुप्रीम कोर्ट ने उसके दावे का जैसे तैसे खंडन कर अपनी कुछ साख यदि बची थी तो उसे बचाई पर मुचुआ को दंड नहीं दे कोई अच्छा संकेत भी नहीं दिया है।
Representation of the People Act, 1950 (RPA) की धाराओं 22 और 23 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत में मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन करने का वास्तविक वैधानिक अधिकार स्थानीय स्तर के Electoral Registration Officer (ERO) के पास होता है। मुचुआ ने इसे भी लगभग खत्म ही कर दिया।
यह काम ECINET सॉफ्टवेयर के जरिए केंद्रीकृत ढंग से करने शुरू कर दिये गए। इसके लिये डॉ सीमा खन्ना को Director General (IT) बना दिया गया। ERO को इस सॉफ्टवेयर का एक्सेस नहीं दिया गया। इसका भी विरोध दोनों चुनाव आयुक्तों ने किया था।
गोवा के 97 वैध मतदाताओं को वहां के अधिकारियों ने मतदाता सूची में जोड़ना चाहा नहीं हो सका। ना तो ECINET का एक्सेस मिला न ही भेजे गए कई email काम कर पाए। मतलब ERO नीचे अपना सिर धुनते रहे और वोटर का नाम ऊपर से ही कटते और जुड़ते रहे।
क्या गजब करते थे ज्ञानू जी,
चोरी करने से ना डरते थे जी।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट हमेशा चुनाव आयोग का साथ खड़ा रहा है इसके पीछे मुख्य कारण उसका चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था मानना रहा है।
परन्तु जहां तक सुप्रीम कोर्ट का SIR और चुनाव आयोग के क्रियाकलाप पर नजरिये का सवाल है उसके बारे में सुप्रीम कोर्ट के ही एक वर्तमान , निष्पक्ष और विद्वान जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने हैदराबाद की NALSAR लॉ यूनिवर्सिटी में जो कहा उसे जान लेना ही काफी होगा।
उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया जो लाखों भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित करती है, वह पूरी तरह से मनमानी है और संविधान पर हमला है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 का उल्लंघन है।
यह भी कहा SIR संविधान के मूल ढांचे पर प्रहार है । किसी भारतीय नागरिक को वोट के अधिकार से वंचित करना उसे अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने जैसा है।
यहां उल्लेखनीय है जनप्रतिनिधि कानून में SR (summery revision) और IR (Intesive revision) की ही व्यवस्था है SIR की नहीं। SR सामान्य/वार्षिक अपडेट वाली प्रक्रिया है। जबकि IR में घर घर जाकर नए सिरे से वोटर लिस्ट बनाए जाने की बात है। दोनों में कोई दस्तावेज नहीं मांगे जाते थे।
Representation of the People Act, 1950 – Section 21(3) के अनुसार चुनाव आयोग किसी भी समय, कारण दर्ज करके, any constituency or part of a constituency की intesive revision का निर्देश दे सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बागची जैसे खतरनाक रूप से काबिल जजों की बेंच को Any और part जैसे शब्द संकीर्ण लगे उसे All और Whole Country जैसा व्यापक बना दिया। इस तरह SIR जिसकी कोई फाइल चुनाव आयोग में भी ही नहीं आसमान से टपक कर वोट चोरी का कानूनी तरीका बन गया?
अब तो ये भी पता चला है कि Typical SIR का फैसला *केचुआ का नहीं अकेले ** मुचुआ का था। मतलब अवैध से भी ऊपर सुपर अवैध। आखिरी कमाल यह अभी तक रद्द नहीं हुआ है।
अब फिर जस्टिस भुईयां की बात आगे बढ़ाते हैं
1995 के 'लाल बाबू हुसैन बनाम ERO ' मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि किसी मृत व्यक्ति को छोड़कर, किसी भी जीवित नागरिक का नाम बिना उचित नोटिस और सुनवाई का मौका दिए वोटर लिस्ट से नहीं हटाया जा सकता।
उम्मीद है इतना से ही आप समझ गए होंगे।
क्या नहीं समझे?
अच्छा ये बताइये Contempt of court से डर लगता है कि नहीं?
जी लगता है!
तो ठीक!
जब तक कुर्सी पर हैं वंदनीय ही हैं ! बस इतना समझ लीजिए।
चोरी का कबूलनामा ?
रितिका चोपड़ा के खुलासे के बाद चुनाव आयोग ने परिवर्तन स्वरूप ताबड़तोड़ कई निर्णय लिए हैं। अब कहा गया है कि प्रत्येक आयोग की बैठक से पहले एजेंडा वितरित किया जाएगा और बैठक के बाद कार्यवृत्त जारी किया जाएगा। अधिकारियों की विदेश यात्राओं के लिए भी आयोग की स्वीकृत लेनी होगी।
बहुत अच्छे!
Form 6 में किया गया बदलाव वापिस भी ले लिया गया। ECI NET की समीक्षा की बात की गई है। इतना ही नहीं SIR हो चुके 20 राज्यों में विशेष अभियान चला कर छूट गये ( काटे गये) वोटरों को जोड़ने का ऐलान किया गया है।
अई शाबाश! कमाल कर दिया।
चोर ने चोरी स्वीकार कर ली। अब आगे से चोरी नहीं करेंगे इसकी कसमें खा रहा है। पर वोट चोरी से बीजेपी की एक के बाद एक फर्जी सरकारें बनवाई उसका क्या?
चोर की कसम की कोई वैल्यू नहीं होती और ये पब्लिक है सब जानती है। ज्ञानू देर न कर जल्द कुर्सी से उतर।
सत्य और सत्ता की अंतिम लड़ाई
अत: 2 अक्टूबर से देश भर में धरना और प्रदर्शन का दौर शुरू हो चुका है। छात्र, युवा ,आम जनता के साथ विपक्ष के नेता सहित सम्पूर्ण विपक्ष बार बार श्री ज्ञानेश कुमार गुप्ता और उनके वोट चोरी वाले क्रियाकलाप के खिलाफ सड़क पर उतर रहा है।
चलिए अब राजनीति में धर्म का तड़का लगाते हैं पिछले 12 सालों से ये ही तो ट्रेंड कर रहा है।
Non biological की दृष्टि से देखें तो त्रेता युग के असली का आज के नकली के बीच मुकाबला रोचक हो चला है। एक तरफ डुप्लीकेट के साथ तमाम प्रशासन और न्यायपालिका है तो दूसरी तरफ ओरिजिनल की लड़ाई विपक्ष,छात्र, काकरोच और Gen Z लड़ रहे है।
नकली के साथ आसुरी शक्ति और गोदी मीडिया का बल है वही असली के साथ सत्य और अहिंसा के रूप में नैतिक बल है।
सत्य और झूठ या असल और नकल की लड़ाई में जीत किसकी होगी ये मुझ जैसे गदहे को भी पता है पर ऐसा अंधभक्तों को भी पता हो ही इसकी गारंटी मैं नहीं ले सकता!
बात जानिए साफ ! करिये मुझे माफ!
जय हिंद।
* केंद्रीय चुनाव आयोग **मुख्य चुनाव आयुक्त
अस्वीकरण : यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और विश्लेषणात्मक है तथा इसमें किया गया व्यंग्य विषय को सरल और रोचक बनाने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या राष्ट्र की मानहानि करना नहीं है।
