दिमागी नक्सल बनाम दिमागी पैदल: एक राजनीतिक व्यंग्य (Dimagi Naxal vs Dimagi Paidal: A Satirical Take on India's Power Politics)

सांकेतिक एवं व्यंग्यात्मक चित्रण (Satirical Illustration)
             

आम तौर पर *नक्सल उस व्यक्ति या समूह को कहा जाता है जो सशस्त्र व हिंसक संघर्ष के जरिए सत्ता या व्यवस्था परिवर्तन करना चाहता है। किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन या अहिंसक आंदोलन को नक्सलबाड़ी आंदोलन और इससे जुड़े लोगों को नक्सल नहीं कहा जा सकता। अर्थात नक्सल के साथ अनिवार्य रूप से हिंसा जुड़ा होता है।

रसगुल्ले से 'दिमागी नक्सल' तक का सफर

लेकिन जिस प्रकार रसगुल्ले के प्रति मुखदंत की प्रतिक्रिया पर किसी को  "रसगुल्ला नक्सल" नहीं कह सकते वैसे ही सवाल पूछने से सत्ताधीशों की दिमागी परेशानी उत्पन्न करने वाले को "दिमागी नक्सल" नहीं कहा  जा सकता। ऐसे में दिमागी नक्सल वही अर्थ है जो वास्तेगुना Huiya का है।

Entire Political Science और भूसे का गणित 

दरअसल, दिमागी नक्सल शब्द का प्रयोग "दिमागी पैदल" होने का ही सबूत पेश करता है भले ही ऐसा करने वाला "Entire Political Science" में MA क्यों न हो ? इससे पहले कि आप कुछ और समझ बैठें मैं स्पष्ट कर दूं  ये मैने अपने बारे में कही है । "Entire Political Science" की डिग्री मेरे पास भी है और राष्ट्रहित में, मैं भी इसे नहीं दिखा सकता ।

देखा जाय तो दिमागी पैदल की निकटता नक्सल से होती है मेरी भी है । क्योंकि दिमाग के साथ भूसे का प्रयोग प्रायः होता देखा गया है। सभी जानते हैं  कि भूसे की निकटता घास से  होती है। उत्तर बंगाल में उगने वाली एक खास प्रकार की घास,कास (काश पुष्प)  को भी 'नक्सल' कहा जाता है।

भारत की राजनीति सत्ता से सवाल करने वाले काल्पनिक दिमागी नक्सल और सवालों से परेशान होने वाले मुझ जैसे वास्तविक दिमागी पैदल के बीच का संघर्ष  बन चुकी है। कथित दिमागी नक्सल अहिंसक आंदोलन और सत्ता से सवाल पूछ कर डेमोक्रेसी  को पुनः वापस लाना चाहते हैं , मेरी परेशानी इसी बात को लेकर है।​

अगर मुझ जैसा 'दिमागी पैदल' प्रधानमंत्री होता 

मुझ जैसा दिमागी पैदल अगर भारत का प्रधानमंत्री होता यह सोच कर ही डर लगता है। मुझे बोलने, सुनने, दिखने और समझने में भी दिक्कत होती। बोलने की दिक्कत को तो  टेलीप्रॉम्पटर से संभालने की कोशिश करता पर कभी कभी ये भी धोखा दे जाता तो अजीब सी स्थिति हो जाती । घिग्घी बंध जाती , " आपको सुनाई पर रहा है" बड़बड़ाने लगता ?

छात्र जब जंतरमंतर पर अहिंसक आंदोलन और प्रदर्शन करते रहते  तो इसे कई दिनों तक न तो देख पाता और न ही सुनता । जब छात्र संसद भवन की ओर बढ़ते तो घबराकर एकदम से लाठी और पेलेट गन ही चलवा देता। क्योंकि दिमागी पैदल, डरपोक भी तो होता है!

पेपर लीक, बेरोजगारी और विद्यार्थियों की वास्तविक समस्याओं को लेकर विपक्ष  के नेता के "छात्रों की सच्ची गूंज" भी मुझे झूठी लगती और उसका सामना करने के लिए बड़े पैमाने पर तमाम ताम-झाम  से "सच के हुंकार" नामक झूठी पैरोडी करता।

घबराहट इतनी होती  कि मत पूछिए। विपक्ष के नेता का हर वाजिब सवाल मुझे इतना परेशान कर देता  कि संसद का सामना करने की हिम्मत नहीं पड़ती। मेरी और मेरी नीतियों की आलोचना करने वाला हर व्यक्ति दुश्मन नजर आने लगता ।

चूंकि उन्हें पारम्परिक गाली देना संभव नहीं होता तब मै  साहिबजादे, आंदोलनजीवी, अर्बन नक्सल,  टुकड़े टुकड़े गैंग, दीदी ओ दीदी,खान मार्केट ,दिमागी नक्सल और नाराज फूफाजी जैसे नई शब्दावली गढ़ता।

नाराज फूफा?

मुझ जैसे दिमागी पैदल की इतनी भी समझ नहीं होती मुझ से नाराज होने वाला हर कोई फूफा नही हो सकता। एक तो लाखों और करोड़ों की संख्या में महंगाई और बेरोजगारी से नाराज लोग, किसान, विद्यार्थियों को फूफा बनाने के लिए उतनी फूफियानं भी तो होने चाहिए। यह भी न सोचा कि अगर हर   कोई फूफा और फूफी ही हो जायेंगे तो भाषण की शुरुआत "माय फ्रेंड" या "भाइयों और बहनों" से कैसे करेंगे ?  Zen Alpha को फूफा बनाने में कानूनी दिक्कत भी तो होती यह तो बिल्कुल ही भूल गया!

चलो ये तो अच्छा हुआ कि मुझ जैसा दिमागी पैदल व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं हुआ नहीं तो विश्व में डंका की बजाय पता नहीं क्या बज जाता?

जय हिंद।

*वर्ष 1967 में नक्सलबाड़ी गाँव में कम्युनिस्ट नेताओं के नेतृत्व में स्थानीय किसानों व आदिवासियों ने जमींदारों और सरकार के खिलाफ एक सशस्त्र (हथियारबंद) आंदोलन किया था। इस स्थान के नाम पर ही इस आंदोलन को नक्सलबाड़ी और इससे जुड़े लोगों को नक्सल कहा जाता है।

अस्वीकरण :  यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और विश्लेषणात्मक है तथा इसमें किया गया व्यंग्य विषय को सरल और रोचक बनाने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या राष्ट्र की मानहानि करना नहीं है।

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