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| सांकेतिक एवं व्यंग्यात्मक चित्रण (Satirical Illustration) |
कांग्रेस के "छात्रों की गूंज" कार्यक्रम में जुटती भीड़ और काकरोच जनता पार्टी के जंतर मंतर आंदोलन को मिली कामयाबी ने सरकार को अहंकार की नींद से जगाया भर था।लेकिन Indian Express में वोट चोरी के खुलासे के बाद राजधानी दिल्ली सहित देश भर में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और SIR के खिलाफ जनता के आंदोलनों ने सरकार को परेशान कर रखा है।ये तो गनीमत है कि गोदी मीडिया के भरोसे रहने वाले भक्त लोग इस खबर से बेखबर है अन्यथा बेचैनी और बड़ी दिखती।
Regime Change की बढ़ती आवाज और 1 नवंबर की दिल्ली रैली
इन आंदोलनों में Regime Change की उठने वाली आवाज और फिर 1 नवंबर को श्री राहुल गांधी की अगुआई में INDIA गठबंधन की "दिल्ली चलो" रैली के कार्यक्रम ने तो सरकार को भयभीत ही कर डाला है। इसमें बाधा डालने के कई प्रयासों के अलावा इसे स्थगित करवाने की भी कोशिश की गई ।
CTI और CAT जैसे व्यापारिक संगठन द्वारा व्यापार का नुकसान के नाम पर 1 नवंबर की रैली टालने के लिए श्री राहुल गांधी को चिट्ठी लिखवाई गई तो कभी सिख धर्म का अपमान का फर्जी मुद्दा भी उठाया।
लेकिन लोगों को आने से व्यापार बढ़ते हैं घटते नहीं । व्यापार का नुकसान सरकार द्वारा बेवजह रोकने, बैरिकेड लगाने और बंद करवाने से होती है। इसलिए श्री राहुल गांधी ने चिट्ठियों का प्रेमपूर्वक जवाब देते हुए लिखा सरकार श्री ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा करवा दे आंदोलन 30 सेकेंड में खत्म हो जाएगा।
जहां तक सिख धर्म के अपमान की बात है तो श्री रविशंकर प्रसाद के मुंह फुलाने के अलावा तर्क में कोई दम ही नहीं था।
Save Democracy , stop Anarchy
इन चिट्ठियों से बात नहीं बनी तो बीजेपी की ओर से विपक्ष की रैली के विरोध में Regime change की बात को "Save Democracy , stop Anarchy" नाम से 1 नवंबर को एक मार्च निकलने की घोषणा की गई है जिसका टकराव के अलावे कोई मतलब नहीं दिखता।
क्योंकि एक तो जिस डिब्बे में फोटो नहीं आता हो उसे tv नहीं कह सकते उसी प्रकार जहां चुनाव ही फर्जी हो उसे डेमोक्रेसी नहीं कह सकते। ऐसे में जो है ही नहीं उसे क्या बचाना?
समस्या समझ गए ना मेरे दोस्त?
विपक्ष के आंदोलनों का उद्देश्य लोकतंत्र का विरोध नहीं बल्कि उसे वापिस लाना है।
Regime Change हमेशा हिंसक नहीं होता
दूसरा Regime change हमेशा हिंसक और अराजक तरीके से नहीं होता। इतिहास में ऐसे कई महत्वपूर्ण उदाहरण मौजूद हैं जहाँ बिना किसी पारंपरिक चुनाव या सैन्य तख्तापलट (Coup) के Regime change हुए हैं जिसे राजनीति विज्ञान की भाषा में प्राय: 'शांतिपूर्ण क्रांति' (Peaceful Revolution) या 'मखमली क्रांति' (Velvet Revolution) कहा जाता है। कई उदाहरण हैं -
1989 चेकोस्लोवाकिया की 'मखमली क्रांति'
यहाँ कम्युनिस्ट पार्टी का एकदलीय और बेहद सख्त नियंत्रण वाला शासन था।नवंबर 1989 में छात्रों और आम नागरिकों ने बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन, मार्च और हड़तालें शुरू कीं। बिना किसी खून-खराबे या हथियारों के, सिर्फ सड़कों पर उमड़े लाखों लोगों के जनसैलाब और शांतिपूर्ण दबाव के आगे घुटने टेकते हुए कम्युनिस्ट सरकार ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बिना किसी तात्कालिक चुनाव के एक गैर-कम्युनिस्ट अंतरिम सरकार का गठन हुआ।
1989 जर्मनी का एकीकरण
पूर्वी जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार जर्मनी के एकीकरण के खिलाफ थी। लीपज़िग और अन्य शहरों में 'मंडे डेमोंस्ट्रेशंस'के रूप में नागरिक सड़कों पर उतरे। यह आंदोलन इतना अनुशासित और अहिंसक था कि सरकार बल प्रयोग नहीं कर सकी। इसके परिणामस्वरूप कम्युनिस्ट नेतृत्व को हटना पड़ा, ऐतिहासिक बर्लिन की दीवार गिरा दी गई और अंततः बिना किसी युद्ध के पूरे जर्मनी का शांतिपूर्ण एकीकरण हो गया।
2011 ट्यूनीशिया की 'चमेली क्रांति' (Jasmine Revolution)
राष्ट्रपति ज़िने एल आबिदीन बेन अली पिछले 23 वर्षों से ट्यूनीशिया के तानाशाह बने हुए थे।एक फल विक्रेता आत्मदाह के बाद, देश भर में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ व्यापक, शांतिपूर्ण और स्वतःस्फूर्त जन-आंदोलन भड़क उठा। जनता के इस अप्रत्याशित और निरंतर शांतिपूर्ण विरोध के सामने सेना ने नागरिकों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। दबाव बढ़ता देख, बिना किसी चुनाव के राष्ट्रपति बेन अली देश छोड़कर भाग गए, जिससे वहां का पूरा शासन तंत्र बदल गया।
इसी प्रकार 2019 में अल्जीरिया का "हिराक आंदोलन" और सूडान का नागरिक आंदोलन भी अहिंसक आंदोलन ही थे जिसने वहां Regime Change कर डाला था।
ये सारे तथ्य विपक्ष के लिए उत्साहवर्धक तो हैं ही सरकार को भी सकून देने वाले हैं।
विपक्ष जहां अपने अहिंसक और शांतपूर्ण रास्ते पर चलते हुए जीत का विश्वास रख सकता है वहीं सरकार बंगलादेश, श्रीलंका या नेपाल में जो हुआ उससे डरने बजाय राहत का सांस ले सकती है कि उसके प्रस्थान के लिए चमेली ( Jasmine) जैसी खुशबूदार और मखमल( Velvett) जैसे निष्कंटक रास्ते भी हैं। सबसे बड़ी बात यह उसके ही हाथ में है कि कौन सा रास्ता चुनती है ?
देखना यही है! आप क्या सोचते हैं?
जय हिंद
अस्वीकरण : यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और विश्लेषणात्मक है तथा इसमें किया गया व्यंग्य विषय को सरल और रोचक बनाने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या राष्ट्र की मानहानि करना नहीं है।
