/* भारत-अमेरिका ट्रेड डील: राष्ट्रहित या 'अब्जेक्ट सरेंडर'? | India-US Trade Deal: National Interest or 'Object Surrender'?

भारत-अमेरिका ट्रेड डील: राष्ट्रहित या 'अब्जेक्ट सरेंडर'? | India-US Trade Deal: National Interest or 'Object Surrender'?

खंडन - इस लेख में किए गए व्यंग्य, लेख की रोचकता बनाये रखने के लिये ही किया गया । यदि फिर भी किसी  दिल को चोट पहुंचती है तो उसके लिये  Indianspolitical.com खेद व्यक्त करता है।


"India-US Trade Deal Impact Analysis"



 ट्रेड डील का बैकग्राउंड: राहुल गांधी का डर या कूटनीतिक मजबूरी?

भारत और अमेरिका के बीच तथाकथित ट्रेड डील का क्रेडिट सिर्फ उन्हें और उनके माय डियर फ्रेंड को नहीं जाता बल्कि इसमें कही ना कहीं विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी का भी हाथ दिखलाई पड़ता है। संसद के सत्र में यदि श्री राहुल गांधी जनरल नरवणे की किताब, जेफरी एपस्टीन की फाइल या अदानी के सम्मन का जिक्र नहीं करते तो शायद यह ट्रेड डील कम से कम इतनी जल्दी तो नहीं होती ?  

इन बातों ने लोकसभा के 56 इंच सीने वाले नेता को इतना डरा दिया कि वे संसद  में भारत के राष्ट्रपति के अभिभाषण का जरूरी जवाब देने की बजाय अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को फोन कर बैठे। फोन पर भी कदाचित वही कह दिया जो चीनी अतिक्रमण के समय जेनरल नवराने को कहा था "जो उचित समझ वो करो"? ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप को जो उचित लगा वो किया। "इत्थं भारत-अमेरिका-देशयोः मध्ये वाणिज्य-सन्धिः सम्पद्यते"

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील में जो बातें अभी तक सामने आई हैं उसे देखने से स्पष्ट होता है कि डील तो अमेरिका ने की और भारत ने सिर्फ हुकुम बजाया है। विश्वास नहीं होता तो जानिए।

समझौते की शर्तें: अमेरिका का फरमान और भारत की चुप्पी

पहले तो इस डील की घोषणा (2 फरवरी 2025) फिर (6 फरवरी को) एक इंटरिम ट्रेड एग्रीमेंट (अंतरिम व्यापार समझौता) का फ्रेमवर्क भी (जिसकी औपचारिक साइनिंग मार्च 2026 के मध्य तक होने की संभावना है)अमेरिका से ही घोषित किया जाता  है भारत की ओर से सिर्फ बधाई और सफाई  दी जाती है। ऐसे में यह प्रतीत होता है कि  एक ने फरमान जारी किया है और दूसरे ने हामी में सिर्फ गरदन हिलाया है।

दो देशों के बीच कोई समझौता राष्ट्रहित को ध्यान में रख कर ही होता है। अमेरिका और भारत के इस ट्रेड डील के प्रावधानों को देखें  तो इसमें भी राष्ट्रहित को तवज्जो दी गई है। परंतु जहां अमेरिका ने अपने राष्ट्रहित को साधा है वहीं भारत अपने राष्ट्रहित के साथ ही समझौता किया है। ये बेबुनियाद नहीं है जरा इसके प्रावधानों को तो देखें!

टैरिफ और कृषि क्षेत्र: किसानों की आय पर सीधा प्रहार

सर्वप्रथम, जो अमेरिका अगस्त 2025 के पहिले भारतीय समानों के आयात पर 2 से 3%  टैक्स लेता था उसे इस डील में अधिकांश समानों पर 18% टैक्स कर दिया।दूसरी तरफ भारत अमेरिकी समानों पर औसतन 17% टैक्स लेता था अब इस डील द्वारा अधिकांश सामानों पर 0% कर दिया गया। यह समान (reciprocal) व्यवस्था नहीं है। सरकार इसे 50% से 18% पर लाना बताकर "बड़ी जीत" कह रही है जो कि भ्रामक है।

क्योंकि बेमतलब बढ़े इस टैरिफ को अब तो वहां की सुप्रीम कोर्ट ने  भी असंवैधानिक घोषित कर दिया है। ऐसे में, नई डील के तहत इसे 18% पर 'कैप' (Cap) करना तकनीकी रूप से एक बढ़ोतरी की तरह दिखता है, न कि कटौती की तरह।

दूसरा भारत ने अपने कृषि क्षेत्र को अमेरिका के लिए खोल दिया है।भारत ने अमेरिकी बादाम, अखरोट, सेब, वाइन और सोयाबीन तेल जैसे उत्पादों पर आयात शुल्क 0% या कम करने का निर्णय लिया है। इससे भारत के घरेलू किसानों, विशेषकर हिमाचल, कश्मीर और महाराष्ट्र के उत्पादकों की आय पर बुरा असर पड़ेगा।अमेरिकी किसानों को भारी सरकारी सब्सिडी मिलती है।यदि ऐसे उत्पाद भारत में कम शुल्क पर आते हैं तो भारतीय किसान प्रतिस्पर्धा में कमजोर पड़ सकते हैं।

डेयरी और संवेदनशील उत्पादों की सुरक्षा पर संदेह:

भले ही सरकार दावा कर रही हो कि दूध, पोल्ट्री, चावल, गेहूं आदि सुरक्षित हैं, लेकिन कांग्रेस का कहना है कि डील में कृषि सेक्टर को काफी हद तक खोल दिया गया है, जिससे लंबे समय में डेयरी किसानों को भी नुकसान होगा। उल्लेखनीय है कि इंटरिम डील में and additional products लिख कर रास्ता खोल कर रखा गया है ।

आत्मनिर्भर भारत नीति कमजोर

इस डील में भारत ने  चिकित्सा और IT क्षेत्रों में व्यापार बाधाएं कम करने और अमेरिकी उत्पादों को अधिक बाजार पहुँच देने का संकेत दिया।भारत का बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए खुल जाएगा।इससे घरेलू उद्योगों और छोटे-मध्यम उद्योगों (MSME) को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है।विपक्ष के अनुसार इससे आत्मनिर्भर भारत नीति कमजोर हो सकती है

इस डील के अनुसार भारत अगले 5 वर्षों में अमेरिका से $500 बिलियन मूल्य के ऊर्जा (LNG/LPG), रक्षा तकनीक, विमान (Aircraft) और कृषि उत्पादों की खरीद पर सहमति दे दी है जबकि ऐसी कोई प्रतिबद्धता अमेरिका ने भारतीय उत्पादों के लिए नहीं जताए हैं। ऐसे में ट्रेड सरप्लस जो अभी तक भारत कर पक्ष में था वो घाटे में बदल सकता है।  कांग्रेस पार्टी के नेता श्री शशि थरूर ने इसे "प्री-कमिटेड परचेज एग्रीमेंट" कहा, जहां  भारत बाजार मांग की जगह , जबरन खरीदने को बाध्य हो रहा है।

डिजिटल  उपनिवेशवाद का खतरा: डेटा प्रवाह और 'अब्जेक्ट सरेंडर'

इस समझौते के तहत भारत और अमेरिका 'विश्वसनीय डेटा प्रवाह' (Trusted Data Flows) के लिए एक फ्रेमवर्क बनाने पर सहमत हुए हैं। इसका मतलब है कि भारतीय डेटा का उपयोग अमेरिकी कंपनियां कर सकेंगी, बशर्ते वे सुरक्षा मानकों का पालन करें।

इतना ही नहीं भारत ने धीरे-धीरे अपने 'डिजिटल सर्विस टैक्स' (जो अमेरिकी टेक दिग्गजों पर लगता था) को वापस लेने या संशोधित करने पर सहमति जताई है। अर्थात अब भारतीय नागरिकों का डेटा अमेरिकी एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए मुफ्त में उपलब्ध होगा। कांग्रेस पार्टी के अनुसार इससे डिजिटल उपनिवेशवाद का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा।

रूसी तेल न खरीदने और निगरानी

यह वास्तव में भारत-अमेरिका ट्रेड डील के सबसे विवादित हिस्सों में से एक माना जा रहा है।इस डील  में भारत ने रूसी तेल के आयात को कम/बंद करने और अमेरिकी ऊर्जा विकल्पों को अपनाने पर सहमति जताई है। अमेरिका राष्ट्रपति का यह बयान "Prime Minister Modi agreed to stop buying Russian Oil, and to buy much more from the United States and, potentially, Venezuela" सनसनीखेज है। 

इतना ही नहीं जॉइंट स्टेटमेंट में अमेरिका द्वारा भारत की रूसी तेल खरीद पर निगरानी का प्रावधान होना निश्चित रूप से  भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा पर आक्रमण है। यह ना केवल भारत मित्र रूस से दूरी बनाने को मजबूर करने वाला है बल्कि इससे देश की मध्यम वर्ग पर ईंधन की कीमतों का बोझ बढ़ सकता है।

कुल मिलकर देखें तो इस ट्रेड डील से भारत को न के बराबर लाभ हुआ है वहीं अमेरिका को दोहरा फायदा हुआ है।अमेरिका ने एक तरफ भारत से बड़ी खरीद (LNG/रक्षा) का वादा लिया और दूसरी तरफ अपने यहां आने वाले भारतीय माल पर शुल्क को एक ऊंचे स्तर (18%) पर 'लॉक' करवा लिया।

विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस पार्टी ने इस डील का पुरजोर विरोध किया है। इसे "ट्रैप डील", "एकतरफा आत्मसमर्पण" और "किसानों के साथ विश्वासघात" करार दिया है। फरवरी 2026 में US सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ को रद्द कर दिया, जिससे कांग्रेस ने कहा कि अब डील की जरूरत ही नहीं बची—सरकार को इसे होल्ड/पॉज करके नए सिरे से नेगोशिएट करना चाहिए। पर सरकार इस डील को करने पर अड़ी हुई है। श्री राहुलगांधी ने इसे "अब्जेक्ट सरेंडर" कहा और पीएम पर "ग्रिप्स और चोक्स" और  कंप्रोमाइज्ड  होने का आरोप लगाया। 

श्रीराहुल गांधी को समझना चाहिए कि "डरो मत, डरो मत" कह देने भर से डर खत्म नहीं हो जाता। डर हर किसीको लगता है चाहे वो biological हो या non-biological । याद नहीं इंद्र भगवान को भी अपनी सत्ता जाने का डर हमेशा बना रहता है। 

यहां भी डर लगता है । 

जब चीन से डर लगता है तो  मुंह से"कोई घुसा था न कोई घुसा है" निकल जाता है। एपस्टिन फाइल से डर लगता है तो इतिहास जितना पुराने मित्र ईरान को दगा देकर इजरायल के गले लिपटना पड़ता है। वैसे ही अमेरिका से डर लगता है तो ट्रेड डील करनी पड़ती है। यहां उल्लेखनीय है कि 2017 के एक ईमेल में Jeffrey Epstein ने लिखा था कि “The Indian Prime Minister Modi took advice and danced and sang in Israel for the benefit of the US president. They had met a few weeks ago. It worked.”  हालांकि MEA ने इसका खंडन किया है!


मुश्किल सिर्फ ये है कि जब सत्ताधारी को ऐसा वाला डर लगता है तो पूरे देश को की स्वायत्तता और संप्रभुता खतरे में पड़ जा ती है। ऐसे में सेटेलाइट स्टेट की धारणा भी पुरानी लगने लगती है ।अब बात "मैं जो बोलूं हां तो हां, मैं जो बोलूं  ना तो ना" से आगे बढ़ "चल बैठ जा , बैठ गईं। खड़ी हो जो खड़ी है गई " तक पहुंच गई है। खैर, अमेरिका के बारे में तो सोचिए जो 4 करोड़ वाले को अपना 51 स्टेट बनाना चाहता था उसे 140 करोड़ वाला  बिना एक पटाखा छोड़े मिल गया। लकीचैप!

इस तथाकथित New India के बनने में बिहार और आंध्रप्रदेश के लोकप्रिय नेता का इतिहास में मीरजाफर और जयचंद की तरह नाम अमर रहेगा। ऐसे में  फिर से  India that is Bharat बनने के लिए डर से और डरपोक दोनों  से मुक्ति पानी होगी। विलक्षण चुनाव आयोग और अदभुत सुप्रीम कोर्ट के रहते ये काम किसी स्वतंत्रता आंदोलन से कम कठिन नहीं रहेगा।

जय हिंद!





Parimal

Most non -offendable sarcastic human alive! Post Graduate in Political Science. Stay tuned for Unbiased Articles on Indian Politics.

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