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वैश्विक शक्ति संतुलन और चरमराती अर्थव्यवस्था
फरवरी के अंत में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर ' हमले से मचे युद्ध ने ना केवल ग्लोबल इकोनॉमी को चरमरा दिया बल्कि मध्य-पूर्व की शक्ति संतुलन को भी बदल दिया है। दक्षिण एशिया के दो प्रमुख देशों—भारत और पाकिस्तान—की वैश्विक भूमिका को भी पूरी तरह पुनर्परिभाषित कर दिया है। विशाल देश भारत मौन साधक बना रहा जबकि छोटा सा पाकिस्तान चमकता शांति दूत बन बैठा है।
भारत बनाम पाकिस्तान: कूटनीतिक भूमिकाओं का बड़ा बदलाव
अफगानिस्तान से युद्धरत, आतंक का सप्लायर के रूप में बदनाम और एक 'फेल स्टेट' के कगार पर पहुंचा पाकिस्तान का मध्यस्थ बन जाना दूसरी ओर लंबे समय से“विश्व गुरु” का डंका बजाने वाला और 'Global South' की आवाज” बनने का दावा करने वाला भारत का पूरे मामले में उपेक्षित मूकदर्शक बना रहना आश्चर्यजनक है। यह "मौन रणनीति"( sailent strategy ) और दोस्त हित वाली विदेश नीति की नाकामी है जो फलाने के रहने से ही मुमकिन हुई है।
पाकिस्तान ने इस युद्ध में आधिकारिक तौर पर Neutral रुख अपनाया, लेकिन कूटनीति में बेहद सक्रिय रहा।युद्ध शुरू होने के कुछ दिनों के भीतर पाकिस्तान ने अमेरिका, ईरान, सऊदी अरब और अन्य क्षेत्रीय खिलाड़ियों से संपर्क बनाए रखा।
फेल स्टेट से 'Peace Broker' तक: पाकिस्तान की सक्रियता
पाकिस्तान के आर्मी चीफ ने सीधे अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में शांति वार्ता आयोजित करवाई और 15 दिनों की सीजफायर कराने में सफलता हासिल की। यद्यपि दूसरे दौर की वार्ता में ईरान शामिल नहीं हुआ पर इसका भी आयोजन इस्लामाबाद में होने और फिर अमेरिका द्वारा एक तरफा और 15 दिनों की सीजफायर की घोषणा ने पाकिस्तान की छवि को एक “Peace Broker” के रूप में स्थापित कर दिया है।
भारत के पीएम की इजरायल यात्रा और 'Timing Error' का संकट
दूसरी तरफ भारत के प्रधानमंत्री की युद्ध शुरू होने से ठीक पहले इजरायल की यात्रा 'Timing error' साबित हुआ। उनके द्वारा, अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) द्वारा घोषित युद्ध और मानवता के अपराधी इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के साथ की गई गलबहियां और फादरलैंड वाली बयानबाजी से भारत को एक “neutral power” की बजाय “aligned power” के रूप में देखा जाने लगा। इससे ईरान और “Global South” देशों में भारत की विश्वसनीयता भी घट गई ।
सामरिक चुप्पी (Strategic Silence) और विश्वसनीयता में आती कमी
इसके अलावे कई बड़े घटनाओं जैसे ईरान के राष्ट्रपति अयातुल्ला खुमैनी और फिर ईरान के 160 से अधिक स्कूली बच्चों की अमेरिका द्वारा की गई हत्या पर भारत की प्रतिक्रिया या तो कमजोर रही या फिर देर से आई। Strategic Silence की इस नीति ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को नुक्सान पहुंचाया।
हिंद महासागर में सुरक्षा प्रदाता की छवि को आघात
इसी तरह भारत से लौट रहे ईरानी जहाज IRIS Dena को अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा डुबाने पर भी भारत की कथित खामोशी से भारत की समुद्री ताकत और हिंद महासागर में Security Provider वाले पहरेदार की छवि को भी आघात पहुंचा। यही कारण है कि भारत का आधिकारिक रूप से Neutral stance अपनाने और सभी पक्षों से संयम बरतने व बातचीत के जरिए समाधान पर जोर देने पर भी किसी देश ने कोई महत्व नहीं दिया।
पाकिस्तान का 'न्यूट्रल वेन्यू' कार्ड और उसके हित
जय हिंद।
