/* इजरायल-अमेरिका-ईरान युद्ध: पाकिस्तान की चमकती 'शांति दूत' भूमिका बनाम भारत की 'मौन साधना'(Israel-US-Iran War: Pakistan's Glittering 'Peace Envoy' Role vs. India's 'Silent Strategy ')

इजरायल-अमेरिका-ईरान युद्ध: पाकिस्तान की चमकती 'शांति दूत' भूमिका बनाम भारत की 'मौन साधना'(Israel-US-Iran War: Pakistan's Glittering 'Peace Envoy' Role vs. India's 'Silent Strategy ')

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं और इसमें किए गए व्यंग्य का उद्देश्य केवल कूटनीतिक विश्लेषण को रोचक बनाना है। हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या राष्ट्र की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या मानहानि करना कतई नहीं है। यदि फिर भी किसी को इससे ठेस पहुँचती है, तो indianspolitical.com उसके लिए खेद व्यक्त करता है।

Political cartoon showing Pakistan as a Peace Broker and India in strategic silence during Israel-US-Iran war 2026.
सांकेतिक एवं व्यंग्यात्मक चित्रण (Satirical Illustration)

वैश्विक शक्ति संतुलन और चरमराती अर्थव्यवस्था

फरवरी के अंत में अमेरिका और इजरायल द्वारा  ईरान पर ' हमले से मचे युद्ध ने ना केवल ग्लोबल इकोनॉमी को चरमरा दिया बल्कि मध्य-पूर्व की शक्ति संतुलन को भी बदल दिया है।  दक्षिण एशिया के दो प्रमुख देशों—भारत और पाकिस्तान—की वैश्विक भूमिका को भी पूरी तरह पुनर्परिभाषित कर दिया है। विशाल देश भारत  मौन साधक बना रहा जबकि छोटा सा पाकिस्तान चमकता शांति दूत बन बैठा है।

भारत बनाम पाकिस्तान: कूटनीतिक भूमिकाओं का बड़ा बदलाव

अफगानिस्तान से युद्धरत, आतंक का सप्लायर के रूप में बदनाम और एक 'फेल स्टेट' के कगार पर पहुंचा पाकिस्तान का मध्यस्थ बन जाना  दूसरी ओर लंबे समय से“विश्व गुरु” का डंका बजाने वाला और  'Global South' की आवाज” बनने का दावा करने वाला भारत का पूरे मामले में उपेक्षित मूकदर्शक बना रहना आश्चर्यजनक है। यह  "मौन रणनीति"( sailent strategy ) और दोस्त हित वाली विदेश नीति की नाकामी है जो फलाने के रहने से ही मुमकिन हुई है।

पाकिस्तान ने इस युद्ध में आधिकारिक तौर पर Neutral रुख अपनाया, लेकिन कूटनीति में बेहद सक्रिय रहा।युद्ध शुरू होने के कुछ दिनों के भीतर पाकिस्तान ने अमेरिका, ईरान, सऊदी अरब और अन्य क्षेत्रीय खिलाड़ियों से संपर्क बनाए रखा।

फेल स्टेट से 'Peace Broker' तक: पाकिस्तान की सक्रियता

पाकिस्तान के आर्मी चीफ ने सीधे अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में शांति वार्ता आयोजित करवाई और 15 दिनों की सीजफायर कराने में सफलता हासिल की। यद्यपि दूसरे दौर की वार्ता में ईरान शामिल नहीं हुआ पर इसका भी आयोजन इस्लामाबाद में होने और फिर अमेरिका द्वारा एक तरफा और 15 दिनों की सीजफायर की घोषणा ने पाकिस्तान की छवि को एक “Peace Broker” के रूप में स्थापित कर दिया है।

भारत के पीएम की इजरायल यात्रा और 'Timing Error' का संकट

दूसरी तरफ भारत के प्रधानमंत्री की  युद्ध शुरू होने से ठीक पहले इजरायल की यात्रा  'Timing error' साबित हुआ। उनके द्वारा, अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) द्वारा घोषित युद्ध और मानवता के अपराधी इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू  के साथ की गई गलबहियां और फादरलैंड वाली बयानबाजी से भारत को एक “neutral power” की बजाय “aligned power” के रूप में देखा जाने लगा। इससे ईरान और “Global South” देशों में भारत की विश्वसनीयता भी घट गई ।

सामरिक चुप्पी (Strategic Silence) और विश्वसनीयता में आती कमी

इसके अलावे कई बड़े घटनाओं जैसे  ईरान के राष्ट्रपति अयातुल्ला खुमैनी  और फिर  ईरान के 160 से अधिक स्कूली बच्चों की अमेरिका द्वारा की गई हत्या पर भारत की प्रतिक्रिया या तो कमजोर रही या फिर देर से आई। Strategic Silence की इस नीति ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को नुक्सान पहुंचाया।

हिंद महासागर में सुरक्षा प्रदाता की छवि को आघात

इसी तरह भारत से लौट रहे ईरानी जहाज IRIS Dena को अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा डुबाने पर भी भारत की कथित खामोशी से भारत की समुद्री ताकत और हिंद महासागर में Security Provider वाले पहरेदार की छवि को भी आघात पहुंचा। यही कारण है कि भारत का आधिकारिक रूप से Neutral stance अपनाने और सभी पक्षों से संयम बरतने व बातचीत के जरिए समाधान पर जोर देने पर भी किसी  देश ने कोई महत्व नहीं दिया। 

पाकिस्तान का 'न्यूट्रल वेन्यू' कार्ड और उसके हित

पाकिस्तान, ईरान के साथ शिया समुदाय से सांस्कृतिक संबंध और 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है, जबकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से उसके रक्षा और आर्थिक संबंध मजबूत हैं। इसके अलावे अमेरिका और चीन दोनों से मित्रता ने भी मध्यस्थ की भूमिका के लिए उपयुक्त बनाया। दरअसल पाकिस्तान अमेरिका से आर्म्स और इकोनॉमिक रिलीफ चाहता है, और ईरान से बॉर्डर स्टेबिलिटी। इसलिए पाकिस्तान ने 'न्यूट्रल वेन्यू' का कार्ड खेला जो सफल होता दिखाई दे रहा है।

प्रभावशाली' के बजाय 'प्रभावित' देश बनता भारत

दूसरी तरफ भारत के लाखों प्रवासी  उन खाड़ी देशों में कार्यरत हैं जो अमेरिका के पिछलग्गू हैं और जिन पर ईरान हमले कर रहा है। इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना  भारत के लिए आवश्यक था। फिर तेल ,गैस और व्यापार के लिए खाड़ी देशों पर भारत की निर्भरता भी अधिक रही है। अत: इस युद्ध में“influencer” नहीं, बल्कि “affected country” बन गया।

आंतरिक दबाव और दोस्ती की हकीकत: एक कूटनीतिक विश्लेषण

रही दोस्ती की बात वो तो "ऑपरेशन सिंदूर" के समय ही पता चल चुका था "कि गल है ,कोई नहीं "? इतना ही नहीं Jeffrey Epstein वाले अमेरिका का दवाब और अडानी प्रभाव से  ईरान और रूस जैसे पुराने और आजमाए मित्रों से भी भारत ने दूरी बना ली है। अर्थात भारत की मध्यस्थता की भूमिका शायद ही कोई स्वीकार करता। ऐसे में भारत के विदेश मंत्री श्री एस जयशंकर द्वारा परोक्ष रूप से पाकिस्तान की  बढ़ती भूमिका को दलाली कहना उनकी हताशा और कुंठा को ही व्यक्त करती है।

यह भारत की “strategic setback” है। इससे साबित होता है कि 21वीं सदी में सिर्फ सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि कूटनीति और perception ही असली ताकत होती है।  यही कारण है कि पाकिस्तान ने सीमित संसाधनों के बावजूद खुद को global mediator बना लिया जबकि भारत, अपनी बड़ी ताकत के बावजूद, इस मौके का पूरा लाभ नहीं उठा सका। पाकिस्तान को युद्ध समाप्त कराने में सफलता मिले चाहे ना मिले अंतरराष्ट्रीय जगत द्वारा उसे  मध्यस्थ के लायक समझना ही उसकी एक बड़ी कामयाबी है।

निष्कर्ष: भविष्य की राह और एक सक्रिय विदेश नीति की दरकार
अगर भारत को “Global Power” बनना है, तो उसे सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि नेतृत्व दिखाना होगा। उसे किसी फाइल के बोझ या दोस्त या देश से दवाब मुक्त विदेश नीति अपनानी होगी। पुन: गुटनिरपेक्षता का दामन थामना होगा। Energy security बढ़ानी होगी Silence strategy की जगह  सक्रिय कूटनीति द्वारा Global Narrative Control करना होगा।

अरे हां!  इसके लिये नेतृत्व का Non - biological होना कतई जरूरी नहीं है? कोई और कैसा भी Biological ही क्यों न हो ? चलेगा! 

जय हिंद।

 

 

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
Ads.txt