खंडन - इस लेख में किये गए व्यंग्य, लेख की रोचकता बनाये रखने के लिये ही किया गया । यदि फिर भी किसी दिल को चोट पहुँचती है तो उसके लिये Indianspolitical.com खेद व्यक्त करता है।
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| "मनरेगा बनाम VB-G राम जी: अधिकार-आधारित रोजगार से आपूर्ति-आधारित योजना तक का सफर।" |
| विशेषता (Features) | मनरेगा (MGNREGA) | VB-G राम जी |
| प्रकार | मांग-आधारित (Demand-driven) | आपूर्ति-आधारित (Supply-driven) |
| अधिकार | कानूनी गारंटी (Legal Right) | सरकारी योजना (Scheme) |
| फंडिंग (केंद्र:राज्य) | 90:10 / 100% मजदूरी | 60:40 साझेदारी |
| नियंत्रण | ग्राम सभा (विकेंद्रीकृत) | केंद्र/राज्य (केंद्रीकृत) |
मनरेगा का नाम बदला या मजदूरों का अधिकार? 'VB-G राम जी' कानून का कड़वा सच
जो इतिहास में नाम नहीं बना सकते वो इतिहास में नाम बदलने को ही ऐतिहासिक कृत्य समझते हैं है और एनडीए सरकार को तो इसमें महारत हासिल है। कई शहरों के नाम ,पुरानी योजनाओं यहां तक कि खेल स्टेडियम के नाम तक बदल डाले। इसी क्रम में संसद के 2026 के शीतकालीन सत्र में मजदूरों के रोजगार गारंटी कानून "मनरेगा" की जगह "VB-G राम जी" लाया गया है। 'मनरेगा" भारत के संवैधानिक इतिहास का पहला ऐसा कानून था जो ग्रामीण परिवारों को "कानूनी अधिकार" (legal right) के रूप में 100 दिनों का अकुशल मजदूरों को रोजगार की गारंटी प्रदान करता था। जबकि नए कानून में भगवान का नाम डालकर महात्मा गांधी का नाम हटाने की क्षुद्रता से रोजगार की गारंटी का ही "राम नाम सत्य "कर दिया गया है।
नाम बदलने की सियासत: गांधी से चिढ़ या इतिहास मिटाने की कोशिश?
"जय राम जी" सदा प्रचलन में रहा है "जी राम जी" हिंदी शब्द कोश में भला कहां से आ गया ये तो कोई "जी नाथूराम जी" ही बता सकते हैं! लेकिन इसके पीछे गांधीवादी मूल्यों से दूरी और महात्मा गांधी से चिढ़ के अलावा कुछ और कारण हो सकता तो बतलाइए! लेकिन सवाल सिर्फ नाम बदलने का नहीं है यहां तो बात भी बदल दिया और जज्बात भी बदल दिया गया है।
गारंटी बनाम वारंटी: मनरेगा और 'VB-G राम जी' के मूल दर्शन में अंतर
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम "मनरेगा" से विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम"VB-G राम जी" ये ग्रामीण रोजगार की मूल दर्शन, वित्तीय ढांचे, कार्यान्वयन की प्रकृति और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार-आधारित स्वरूप में गहरा परिवर्तन है। यह सिर्फ नाम का बदलाव नहीं बल्कि ग्रामीण रोजगार के दर्शन (Philosophy of Rural Employment) में एक बड़ा शिफ्ट है। जहां मनरेगा एक 'Demand-driven' मॉडल था जो मजदूरों को काम मांगने का कानूनी अधिकार देता था, वहीं नया कानून इसे 'Supply-driven' बनाता है।
इसका सीधा मतलब है कि अब रोजगार बजट और सरकारी योजनाओं की उपलब्धता पर निर्भर करेगा, न कि मजदूर की जरूरत पर। यह बदलाव मजदूरों को 'हकदार' से 'याचक' की श्रेणी में खड़ा कर देता है।
जहां मनरेगा में रोजगार एक संवैधानिक भावना से जुड़ी कानूनी गारंटी थी,जबकि VB-G राम जी में सही मायने में यह गारंटी ही नहीं,बल्कि वारंटी भी नहीं रह जाती। यह अधिकार से अधिक नैतिक अपेक्षा बन कर रह गया है।
यह सही है कि भ्रष्टाचार, भुगतान में देरी, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी जैसी कई समस्याएं मनरेगा के साथ जुड़े रहे हैं पर ये क्रियान्वयन की समस्या थी, अवधारणा की नहीं। सिर्फ इसे सही करने की जरूरत थी। यहां तो मर्ज को खत्म करने की जगह मरीज को ही खत्म कर दिया गया।मनरेगा अपूर्ण था लेकिन वह ईमानदार था—उसने माना कि बेरोज़गारी सरकार की भी समस्या है।VB-G राम जी परिपूर्ण दिखता है क्योंकि वह मानता है कि बेरोज़गारी केवल गरीब की मानसिक कमजोरी है।
ऐसा इन दोनों कानूनों के प्रावधानों में अंतर से समझा जा सकता है।
डिमांड-ड्रिवन (मांग) से सप्लाई-ड्रिवन (आपूर्ति) तक: मजदूरों की बढ़ती बेबसी
मनरेगा, मांग-आधारित (Demand-driven) व्यवस्था थी जिसमें कोई भी पात्र वयस्क सदस्य ग्राम पंचायत में काम मांग सकता था; 15 दिनों के भीतर काम नहीं मिला तो बेरोजगारी भत्ता मजदूरी का 25 से 50% तक अनिवार्य था।
जबकि VB-G राम जी,आपूर्ति (Supply - driven) व्यवस्था है इसमें काम पूर्व-अनुमोदित योजनाओं और आवंटन पर निर्भर है → यदि बजट/योजना खत्म हो गई तो मांग के बावजूद काम नहीं मिलेगा। ऐसे में क्या गारंटी ?
यद्यपि VB-G राम जी में भी बेरोजगारी भत्ता का प्रावधान बरकरार है, लेकिन इसे भी कार्य पूर्व-अनुमोदित योजनाओं पर निर्भर रखा गया ।
वित्तीय बोझ और विकेंद्रीकरण का अंत: राज्यों की चुनौती
मनरेगा में मजदूरी का 100% केंद्र वहन करता था, सामग्री लागत का 75%। इसे VB-G राम जी में केंद्र-राज्य साझेदारी 60:40 के अनुपात में कर दिया गया है। कई राज्यों को इस वित्तीय बोझ को झेलने में दिक्कत होगी जिसका असर मानव दिवस पर पड़ना सुनिश्चित है।आर्थिक रूप से कमजोर राज्य , काम सीमित कर सकते हैं।
मनरेगा में मज़दूरों की मांग पर ग्राम सभा काम सृजित करती थीं और उस पर उनका ही अंतिम नियंत्रण होता था। कार्यों के प्रकार भी लचीले थे और इसके लिए 260 से अधिक श्रेणियां थी।
VB-G राम जी में ग्राम सभा सिर्फ सुझाव दे सकती है काम का सृजन , प्राथमिकता, अनुमोदन , फंडिग केंद्र/ राज्य सरकार की योजनाएं तय करने वाली हैं। अंतिम नियंत्रण केंद्र सरकार का होगा।जहां तक कार्यों के प्रकार का सवाल है उसे भी मात्र चार श्रेणियों में सीमित कर दिया गया है -जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण बुनियादी ढांचा, जलवायु अनुकूल कृषि, आजीविका में वृद्धि।
स्पष्ट है कि VB-G राम जी में मजदूर सीधे मांग कर काम नहीं बनवा सकता; काम पहले से अनुमोदित योजनाओं में उपलब्ध होना चाहिए। इससे मजदूरों की स्थिति दावेदार से याचक की हो गई है। ऐसे में गारंटी तो छोड़िए वारंटी भी नहीं रही। ग्राम सभा के अधिकार को सुझाव देने तक सीमित कर ग्राम पंचायती लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर किया गया है।
125 दिन का झांसा और 'ब्लैकआउट पीरियड' की हकीकत
मनरेगा में मजदूरों को काम मांगने की कोई विराम अवधि नहीं थी जबकि VB-G राम जी में बुवाई-कटाई के मौसम में काम रोका जा सकता है इसके लिए 60 दिनों की अनिवार्य विराम अवधि (blackout period) रखी गई है ताकि किसानों को मजदूर मिलें। किसानों को फायदा पहुंचाने के नाम पर मजदूरों की सौदेबाजी की शक्ति कम करने की ये कोशिश उनकी आय भी प्रभावित करेगी। ऐसा लगता है सरकार खुद विराम लेना चाहती है।
रोजगार गारंटी मनरेगा के 100 से बढ़ाकर VB-G राम जी में 125 दिन प्रति परिवार प्रति वर्ष किया गया है जो सुनने में अच्छा लगता है पर वास्तविकता ये है चाहे UPA की सरकार हो या NDA की मजदूरों को काम देने का औसत 44 से 52 दिनों का ही रहा है। ऐसे में 100 दिन हो 125 दिन क्या फर्क पड़ता है?
VB-G राम जी में भुगतान की अवधि सात दिन और अधिकतम 15 दिन का टारगेट रखा गया है जो अच्छी बात है।लेकिन मनरेगा में यह 15 दिन था पर भुगतान की समस्या तब भी थी और अब नहीं रहेगी इसकी गारंटी नहीं है। क्योंकि दिसंबर 2025 के अंत तक (नवंबर 26, 2025 तक के आंकड़े): लगभग 10 हजार करोड़ से अधिक की देनदारियां लंबित थीं। यह राशि केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को जारी नहीं की गई देनदारियां हैं, जिसमें मजदूरों की बकाया मजदूरी, सामग्री खरीद का भुगतान और प्रशासनिक खर्च सब शामिल हैं।
यह नहीं भूलने चाहिए कि "मनरेगा" गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए एक मजबूत सुरक्षा जाल साबित हुआ था खासकर 2008 वैश्विक मंदी और 2020-21 के कोरोना संकट में। लगभग 30 करोड़ जॉब कार्ड, 3000 करोड़+ मानव-दिवस सृजन, 55% महिलाओं की भागीदारी और ग्रामीण पलायन में कमी इसकी उपलब्धियां रही हैं। VB-G राम जी द्वारा इन सभी में भयंकर कमी आनेवाली है।
रोजगार की कानूनी गारंटी कागज पर बनी हुई है, लेकिन उसकी प्रभावी ताकत काफी कमजोर हो गई है। यह बदलाव 'विकसित भारत' के सपने को तेजी से पूरा करने के नाम पर गरीब मजदूरों के लिए यह सुरक्षा कवच को कमजोर करना है।यह ग्रामीण रोजगार की दर्शन में गहरा बदलाव है – अधिकार से योजना, मांग से आपूर्ति, विकेंद्रीकरण से केंद्रीकरण की ओर। दरअसल VB-G राम जी रोजगार की गारंटी नहीं बल्कि इस गारंटी के लिये खतरा है।
अधिकार से याचना की ओर—अब सब 'राम भरोसे'!
खतरे की बात चली है तो आज खतरा कहां नहीं है? सेक्युलरिज्म पर खतरे की बात पुरानी हो चुकी है अब खतरा वेलफेयर स्टेट की धारणा पर भी आ चुका है। देश नई दिशा शक्ति से लोक कल्याणकारी राज्य से मित्र कल्याणकारी राज्य में तीव्र गति से परिवर्तित हो रहा है। ऐसे में सोचने की बात है जो काम चुनाव के समय सिर्फ एक बार मुफ्त में रूपये बांटने से हो जाता हो उसके लिये मजदूरों का साल भर का सिरदर्द भला क्यों ली जाय? काम भी हम ही ढूंढे और दाम भी हम ही दें- धत!
इतनी तो समझ होनी ही चाहिए कि जहां जनमत की जगह तंत्रमत सरकार चुनती हो वहां जनता के प्रति जिम्मेदारियों से उदासीनता स्वाभाविक होती है। समझे जी कि नहीं?
जी समझा !
क्या समझे?
VB-G राम जी मतलब रोजगार की गारंटी अब राम भरोसे ?
अई शाबाश!
जयहिंद।
