![]() | |
सांकेतिक एवं व्यंग्यात्मक चित्रण (Satirical Illustration) | |
भारत की अर्थव्यवस्था दवाब में है यह विपक्ष में चर्चा का विषय रहा पर सरकार इंकार करती रही। लेकिन बंगाल चुनाव को सिस्टम द्वारा निपटाते ही सरकार को भी इस दवाब का अहसास हुआ।
सिस्टम का खेल और जनता की घबराहट: एक अनोखी अपील
जब प्रधानमंत्री ने पूरे देश से देश भक्ति के नाम पर इस तरह की अपील कर दी कि सोना ना खरीदो, विदेश मत जाओ,तेल कम खाओ, वर्क फ्रॉम होम करो, कार पुलिंग करो और Electrical Vehicle अपनाओ तब से देश में घबराहट का माहौल पैदा हो गया। गनीमत है कि उन्होंने सांस लेनी भी है या कम लेनी है इस पर कुछ नहीं कहा।
वैसे इस अपील के फौरन बाद उन्होंने 5 देशों की यात्रा पर निकल कर जनता की घबराहट को कम करने की यथासंभव कोशिश भी की। ऐसी ही कोशिश देश के कानून मंत्री ने चीफ जस्टिस और उनके काफिले को ले बैडमिंटन खेलने लन्दन निकल कर के किया।
ईरान-अमेरिका युद्ध: हकीकत या ढाल?
दरअसल भारतीय प्रधानमंत्री मानते हैं या बतलाते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर इस दवाब या संकट का एकमात्र कारण ईरान-अमेरिका युद्ध है जिसने वैश्विक बाजारों, तेल कीमतों और व्यापारिक माहौल में उथल पुथल मचा दिया है। भारत जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर करता है कि उसके लिए अब और अधिक विदेशी मुद्रा की जरूरत आ पड़ी है।
ऐसे समय में सवाल उठ रहा है कि प्रधानमंत्री की यह सोच ही पूरी सच्चाई है ?क्या वास्तव में भारत की आर्थिक चुनौतियाँ केवल इसी वैश्विक संकट का परिणाम हैं, या देश पहले से ही आर्थिक दबावों से गुजर रहा था? क्या भारत की अमेरिका-समर्थक विदेश नीति और पश्चिमी रणनीतिक झुकाव ने भी मौजूदा आर्थिक दबावों को बढ़ाने में भूमिका तो नहीं निभाई है? इसके लिए अर्थ व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है।
रुपया और आयात का गणित
भारतीय रुपये की लगातार गिरावट आर्थिक दबाव का बड़ा संकेत रही है और यह अमेरिकी - ईरान युद्ध से पहले से लगातार जारी है।युद्ध से पहले ही रुपया 90 प्रति डॉलर पहुंच चुका था जो अब 95 और 96 के बीच टहल रहा है।डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से तेल, गैस और अन्य आयात भी महंगे हो जाते हैं।
रूपये की कीमत गिरने का प्रमुख कारण घरेलू नीतियों के कारण बढ़ता व्यापार घाटा, बढ़ता ऊर्जा आयात बिल, विदेशी निवेशकों की पूंजी निकासी और अमेरिकी टैक्स में बढ़ोतरी है।
रोजगार का जमीनी सच
हालांकि सरकार रोजगार आंकड़ों में सुधार की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति उतनी मजबूत दिखाई नहीं देती। बड़ी संख्या में युवा आज भी स्थायी और सम्मानजनक रोजगार की तलाश में हैं।
सरकारी नौकरियों के लिए करोड़ों आवेदन और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी ,घोटाले और पेपर लीक यह संकेत देती है कि आर्थिक विकास का लाभ रोजगार बाजार तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। ऐसी स्थिति के लिए नूतन युद्ध को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
महंगाई की मार
महंगाई का असर सबसे ज्यादा मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर पड़ा है। खाद्य तेल, रसोई गैस, सब्जियों और परिवहन लागत में वृद्धि ने घरेलू बजट पर दबाव बढ़ाया।हालांकि सरकार सब्सिडी और मुफ्त राशन योजनाओं के जरिए राहत देने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह भी दर्शाता है कि बड़ी आबादी आर्थिक रूप से संवेदनशील स्थिति में अमेरिका और ईरान युद्ध से पहले से पहुंच चुकी थी ।
गांवों की हालत
भारत की बड़ी आबादी गांवों में रहती है और कृषि पर निर्भर है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण आय की वृद्धि अपेक्षाकृत कमजोर रही।खेती की बढ़ती लागत,महंगा डीजल और उर्वरक,
सीमित MSP खरीद ,मौसम संबंधी जोखिम और
छोटे किसानों की कम आय ने ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की चूलें हिला दी है।
ग्रामीण मांग कमजोर होने से FMCG, ऑटोमोबाइल और छोटे व्यापार भी प्रभावित हुए। कई कंपनियों ने अपनी रिपोर्ट में माना कि ग्रामीण उपभोग शहरों की तुलना में धीमा रहा।
छोटे उद्योगों की दुर्दशा
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। लेकिन इस क्षेत्र को नोटबंदी और GST जैसे सरकार के फैसलों ने जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। रही सही कसर कोविड लॉकडाउन
ने पूरी कर दी।
नोटबंदी के बाद से अब तक लगभग 1.61 लाख सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) बंद हो चुके हैं जो कि भारत में बढ़ती बेरोजगारी के मुख्य सबब हैं।यद्यपि सरकार ने राहत योजनाएं दीं, लेकिन छोटे व्यापारियों का बड़ा वर्ग आज भी वित्तीय दबाव महसूस करता है। इन बातों का भी ईरान और अमेरिका युद्ध से कोई लेना देना नहीं है।
ऊर्जा और तेल पर निर्भरता
भारत की सबसे बड़ी आर्थिक कमजोरियों में से एक ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता है। 2014 के पहले कच्चे तेल की आयात निर्भरता लगभग 78% थी जो अब बढ़ कर 85% हो गई। इसका कारण बढ़ती मांग से अधिक कम उत्पादन रहा है। यह पहले से रहा है जिसे पश्चिम एशिया में तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में संकट ने सिर्फ बढ़ा दिया है।
विदेश नीति पर गंभीर सवाल (राम माधव का बयान)
इन बातों की पुष्टि बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव श्री राम माधव ने अमेरिका के वाशिंगटन स्थित 'हडसन इंस्टीट्यूट' में एक पैनल चर्चा में कर दी। उन्होंने कहा कि
(1) अमेरिका के कहने पर भारत ने देश में विपक्ष की भारी आलोचनाओं के बाबजूद ईरान और रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया।
(2) भारत ने बिना किसी ना नुकुर के अमेरिका द्वारा लगाए गये 50% टैक्स को भी स्वीकार कर लिया ।
श्री राम माधव के कबूलनामे के अलावा भारत और अमेरिका के बीच होने वाली ट्रेड डील भी भारतीय अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने वाली है। इसका कबूलनामा भी आज नही तो कल कोई न कोई दे ही देंगे? क्योंकि अमेरिका में भारतीय वस्तुओं के आयात पर 18% टैक्स जबकि भारत में अमेरिकी वस्तुओं के आयात पर 0% टैक्स को भारत के हक में नहीं कहा जा सकता। इसके अलावे कृषि क्षेत्र को अमेरिकी उत्पादों के लिए खुला छोड़ देना भारतीय किसानों के लिए आफत को आमंत्रण देना ही है।
निष्कर्ष
गहन और संक्षिप्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि भारत की अर्थव्यवस्था बेरोजगारी, महंगाई, ग्रामीण संकट, रुपये की कमजोरी और ऊर्जा निर्भरता जैसी चुनौतियों से पहले से ही जूझ रही थी। ईरान-अमेरिका युद्ध ने इन समस्याओं को और अधिक बढ़ाया भर है। देखा जाय तो अमेरिकी परस्त विदेश नीति ने भी भारत को अभी तक लाभ की बजाय हानि ही पहुंचाया है। दोस्त! दोस्त कहकर अमेरिका ने भारत के अर्थ और प्रतिष्ठा को जितना नुकसान पहुंचाया है वैसा नुकसान शायद किसी दुश्मन ने भी नहीं किया था।
सच्चाई तो यही है कि भारत के पास आज भी विशाल आर्थिक संभावनाएँ हैं, लेकिन इन संभावनाओं को स्थायी मजबूती में बदलने के लिए केवल GDP वृद्धि नहीं, बल्कि रोजगार, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर भी समान ध्यान देना होगा। Compromised होने की जरूरत नहीं बस
मित्र कल्याण और किसी एक दो तीन फाइल के दवाब से मुक्त होकर स्वतन्त्र विदेश नीति का अवलंबन करना होगा।
अंतिम संदेश
हमें कोई टैक्स टेरेरिस्ट कहे, हमारी अर्थव्यवस्था को खत्म बतलाये, मेरे पाकिस्तान के बीच युद्ध को रोकने की क्रेडिट लेता रहे हमारे नेता के कैरियर को खत्म करने की धमकी दे या
फिर हमारे जहाज पर के नाविकों को ही मार दे तो हमें खी-खी करने की बजाय मुंहतोड़ जवाब देने चाहिये। डरने की बजाय आज प्रतिरोध की जरुरत देश के अंदर और बाहर दोनों जगह है। अरे! जो ताकत वियतनाम, तालिबान और ईरान को नहीं हरा सका वो हमारा क्या बिगाड़ लेगा? ऐसे में जब हम डेढ़ अरब को एक साथ यह चिल्लाना पड़ा तो चिल्लायेंगे
....... दर! ना कर सरेंडर !
जय हिंद
अस्वीकरण : यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और विश्लेषणात्मक है तथा इसमें किया गया व्यंग्य विषय को सरल और रोचक बनाने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या राष्ट्र की मानहानि करना नहीं है।
