/* बंगाल चुनाव परिणाम 2026: जनतंत्र की हार या 'सिस्टम' की सोची-समझी जीत?( West Bengal Election Results 2026: A Victory of 'The System' Over Democracy?)

बंगाल चुनाव परिणाम 2026: जनतंत्र की हार या 'सिस्टम' की सोची-समझी जीत?( West Bengal Election Results 2026: A Victory of 'The System' Over Democracy?)


"बंगाल चुनाव 2026 पर एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक कार्टून (political cartoon), जो 'जनमत' (निचली रस्सी) और संस्थागत 'सिस्टम' (ऊपर की रस्सी) के संघर्ष को दर्शाता है। यह दिखाता है कि कैसे 'SIR' वोटर लिस्ट, मीडिया, पुलिस और सुरक्षा बल जैसे घटक मिलकर 'सिस्टम' की जीत सुनिश्चित कर रहे हैं।"

चुनाव का बदलता स्वरूप: रोमांच की जगह अब 'सिस्टम' का कब्जा?

भारतीय राजनीति में  5 राज्यों के विधानसभा चुनाव  और उनके परिणाम को लेकर काफी गहमागहमी रही।लेकिन चुनाव परिणाम की संभावना को लेकर पहले वाली दिलचस्पी और रोमांच अब रहा नहीं है। क्योंकि चुनाव प्रक्रिया ने अपना स्वरूप बदल लिया है। अब यह न तो स्वतंत्र रहा और न ही निष्पक्ष। यदि खेल में पक्षपात हो, तब ऐसे खेल का मज़ा और रोमांच सिर्फ भक्तों के लिए रह जाते हैं सामान्य जन के लिए नहीं। भारत में चुनाव एक ऐसा ही खेल बन गया है जिसमें पूरी प्रक्रिया एक देश, एक चुनाव और एक दल की दिशा में तेजी से चल रही है।

इस प्रक्रिया में चुनाव आयोग, प्रशासन, मीडिया, सुरक्षा और जांच एजेंसियां, यहां तक की कोर्ट भी, सबने मिल कर एक ऐसे तंत्र (System) का रूप ले लिया है जिसका एकमात्र उद्देश्य एक विशेष दल और उसके गठबंधन की जीत सुनिश्चित करना है। 

ऐसे में अब चुनावी लड़ाई राजनीतिक पार्टियों की बजाय जन और तंत्र System(तंत्र) के बीच होती है और जीत हार भी किसी मुद्दे पर नहीं बल्कि इस बात पर निर्भर करती है सिस्टम चाहता क्या है और उसकी तैयारी कितनी है? 

केरल और तमिलनाडु:  'जनमत' अब भी 'तंत्र' पर भारी 

इस पृष्ठभूमि में इन 5 राज्यो  के चुनावों को देखें तो इनमें से केरल और तमिलनाडु में डबल इंजन की सरकार नहीं थी वहां जनमत की भूमिका प्रभावी हो सकती थी। System की वहां कोई हैसियत भी नहीं थी, न उसने इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास ही किया। 

इसलिए केरल में कांग्रेस वाली UDF को  बहुमत(102)जीत मिली जबकि तमिलनाडु में फिल्मस्टार विजय की पार्टी TVK ,106 सीटों पर जीत के साथ  सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है।

जबकि असम और पुदुचेरी में डबल इंजन होने से वहां System मजबूत स्थिति में था विपक्ष की दाल में वहां गलने नहीं दी जाती। असम में तो System अनुकूल और  जनतंत्रघातक Delimitation भी कर लिया गया था ऐसे में वहां विपक्ष कांग्रेस के लिये कोई उम्मीद बचती ही नहीं थी। फलत: यहां System की जो सरकारें थी वो बरकरार रहीं। 

बंगाल फतह की पटकथा: जब लोकप्रिय सरकार 'नव-तंत्र' के सामने ढह गई

असल लड़ाई तो बंगाल में थी। क्योंकि वहां डबल इंजन की बजाय टीएमसी की सुश्री ममता बनर्जी की अत्यंत लोकप्रिय और मजबूत सरकार थी पर System वहां किसी की भी कीमत पर जितना चाहता था। वैसे System की दिली इच्छा पिछली विधानसभा चुनाव में ही यहां जीत हासिल करने की थी पर तैयारी में कुछ कमी के चलते यह हो नहीं सका था।

इस बार System की तैयारी पूरी थी और उसने बंगाल फतह आखिर कर ही लिया। सुश्री ममता बनर्जी अपनी लाख कोशिशों के बावजूद 2014 के बाद विकसित नव तंत्र (System) से अपना किला नहीं बचा सकी। परिणाम सिस्टम  206 जबकि टीएमसी मात्र 80 । इस जीत में सिस्टम के सभी घटकों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया जिसे देश में नव स्थापित तानाशाही के इतिहास में स्वर्णाक्षर में लिखा जायेगा। यथा-

चुनाव आयोग की भूमिका: 91 लाख मतदाताओं के नाम कटने का रहस्य

केंद्रीय चुनाव आयोग जिस पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करने की मुख्य जिम्मेवारी होती है वो बंगाल चुनाव में फिर निर्लज्जता  से सिस्टम के साथ ताल से ताल मिलाता रहा। वोटर जोड़ने और काटने का काम जिसे श्री राहुल गांधी ने वोट चोरी का नाम दिया था उसे SIR के जरिए बिहार की तरह बंगाल में भी अंजाम दिया गया।

बिहार में 69 लाख वोटर काटे गए थे तो यहां लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए। उल्लेखनीय है 2021 के चुनाव में टीएमसी को बीजेपी पर 60. 6 लाख वोटों से जीत मिली थी वहीं इस बार सिर्फ 32 लाख( लगभग) वोटों से हार मिली है। ऐसे में 91 लाख वोटरों का नाम काट देना चुनाव परिणाम को पलटने के लिए ही किया गया ऐसा नहीं मानने का कोई औचित्य नहीं बचता?

Dead तो परिचय पत्र को लेकर वोट देने तो आते नहीं, रही  Duplicate वोटर्स की पहचान कर हटाने का काम  तो वो भी सॉफ्वेयर के माध्यम से दो मिनिट में हो सकते थे। खेल "Absent", "shifted" और "Logical Discrepancy" के नाम पर किया गया और मनमाने तरीके से नाम काटे गए।

बिहार की तरह यहां भी टीएमसी और विपक्ष चिल्लाता रहा कि  ज्यादातर गरीब, मुस्लिम और उनके समर्थक मतदाताओं को नाम काटा गया। पर "नक्कारखाने में तूती की आवाज", कोई सुनता है भला?

SIR और Logical Discrepancy: वोटिंग के अधिकार पर तकनीकी प्रहार

बंगाल SIR में ASDD (Absent, Shifted, Dead, Duplicate) के अलावे नए "Logical Discrepancy" ( दस्तावेजों में नाम, उम्र, परिवार संबंध आदि में विसंगतियां) कैटेगरी भी इस्तेमाल की गई जिसके तहत 27 लाख ऐसे मतदाताओं को भी मत नहीं देने दिया जिनकी अपील लंबित थी। 

अगर कोई व्यक्ति वैध दस्तावेज दिखाने के बावजूद “Logical Discrepancy” के नाम पर बाहर कर दिया जाए, तो यह  मताधिकार के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं तो क्या है ?  है ना कमाल!

कमाल तो यह भी है कि बिहार की तरह बंगाल में भी एक भी घुसपैठिया नहीं मिला? आश्चर्य है कि जहां भी चुनाव होने लगते हैं घुसपैठिए पहुंच जाते हैं और चुनाव होते ही गायब भी हो जाते हैं। घुसपैठिए नहीं हुए गोया उड़ते हुए मतदाता(Flying Voters) हो गए। एक बांग्लादेश से आ जाता है तो दूसरा ब्राजील से ? जो भी हों, दोनों का एक ही उद्देश्य सिस्टम को जीत दिलाना है।

उल्लेखनीय है बिहार में 21 लाख नए मतदाता जुड़े जबकि बंगाल में इनकी संख्या सिर्फ 7 लाख रही। बिहार की जनसंख्या अधिक है( बिहार 13 करोड़ बंगाल की 10.5 करोड़ लगभग) फिर भी इस संख्या में  “Logical Discrepancy” तो लग रही है?

संख्या का कम होने का कारण बंगाल में गर्मी अधिक होना रहा होगा? इसीलिए संभव है कि अधिकतर  उड़ते हुए मतदाता (Flying Voters) बंगाल की बजाय  साइबेरिया चले गए हों?  "Logical Harmony" तो यही कहता  है?

"उड़ती हवा सा है वो, कहां गया उसे ढूंढों।"

आचार संहिता का मजाक: जब रैलियों में मर्यादा की सीमाएं लांघी गईं

System के दल के अध्यक्ष हों या देश के प्रधानमंत्री या फिर गृह मंत्री सबके सब  चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करते रहे ।MMC (Model Code of Conduct) लागू रहते बिना इंटरनेट के ईमेल भेजने वाले यशस्वी प्रधानमंत्री ने 18 अप्रैल को राष्ट्र को संबोधित किया, जिसमें उन्होंने सम्पूर्ण विपक्ष पर महिलाओं के आरक्षण बिल को रोकने का आरोप लगाया और "भ्रूण हत्या" जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया।

प्रधानमंत्री को शायद याद नहीं रहा। रिटायर नहीं हुए तो क्या उमर तो 75 पार हो चुकी है ? असल में  तो महिला आरक्षण बिल  2023 में ही सर्वसम्मति से पारित हो चुका था। 

इसी तरह अपने जो है ना, काबिल गृहमंत्री  कई रैलियों में कहते रहे टीएमसी के गुंडों( समर्थकों)"29 अप्रैल को घर से बाहर निकले तो 5 मई के बाद उल्टा लटकाकर सीधा कर देंगे"। यह गृहमंत्री की ही भाषा है ना? किसी तड़ीपार की तो नहीं? 

System दल के  नूतन और नवीन अध्यक्ष ने तो और ही कमाल कर दिया। वे CRPF के गाड़ी पर बैठ कर प्रचार करने लगे मानो वो देश की नहीं उनके दल की सवारी हो।

वोट डालती महिलाओं की निजता का ख्याल रखने वाले परमज्ञानी ज्ञानेश कुमार वाली चुनाव आयोग का कहना ही क्या? MCC के इन उल्लंघनों  पर कोई एक्शन ही नहीं लिया। कोई चेतावनी या नोटिस तक नहीं।

हा हा, ही ही ,और खी खी !

वो जो करें विदेश में 

सिस्टम करे देश में 

सेम टू सेम।

अदभुत!

अभूतपूर्व किलेबंदी: बंगाल में केंद्रीय बलों की रिकॉर्ड तैनाती और तबादले

ECI ने बंगाल में सैकड़ों (कुछ रिपोर्ट्स में 400+ ) IAS, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का ट्रांसफर किया — अन्य राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा। ECI ने  यह भी आदेश दिया कि काउंटिंग सुपरवाइजर/असिस्टेंट में कम से कम एक Central/PSU कर्मचारी हो।

बंगाल में 30 observers (UP में सिर्फ 4) के अलावे पहली बार 8000+ micro-observers की भी तैनाती की गई। साथ ही  95 की बड़ी संख्या में पुलिस आब्जर्वर की भी नियुक्ति की गई।  टीएमसी ने इसे बंगाल में अत्यधिक निगरानी और मतदाताओं को डराने-धमकाने का प्रयास कहा।

पश्चिम बंगाल 2026 विधानसभा चुनाव के दौरान भारत के चुनावी इतिहास में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF - CRPF, BSF, CISF, ITBP, SSB आदि) की  अब तक की सबसे बड़ी तैनाती की गई। कुल तैनाती (पोलिंग के दौरान): लगभग 2,400 से 2,550 कंपनियां (करीब 2.4 लाख से 2.55 लाख जवान)।

इतनी तैनाती तो कश्मीर में भी 370 को संशोधित करते समय नहीं की गई थी। एक  चुनाव ही तो था अमेरिका  ईरान युद्ध तो नहीं। टीएमसी ने इसे राज्य पर केंद्र का कब्जा बतलाया जिसका उद्देश्य विपक्ष के वोटर्स को डराना था।

चुनाव आयोग के एक Police Observer ने Chief Electoral Officer, West Bengal के माध्यम से एक मेमो/आदेश जारी किया। इसमें लगभग 800 लोगों बाद में 1300 (ज्यादातर TMC कार्यकर्ता, पंचायत सदस्य, काउंसलर, कुछ MLAs/MPs) की एक  “Troublemakers List” तैयार कर preventive arrest  करने का आदेश दिया। 

यद्यपि कोलकाता हाई कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दिया था तथापि  टीएमसी  शिकायत करती रही कि preventive arrests जारी  है।

ED, CBI और NIA: चुनाव के दौरान जांच एजेंसियों का 'रणनीतिक' उपयोग


बंगाल 2026 विधानसभा चुनाव के दौरान केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED, CBI, NIA, IT Department) की भूमिका सिस्टम के पक्ष में  काफी सक्रिय रही । अकेले ED ने मार्च-अप्रैल 2026 में करीब 20 ऑपरेशन किए  जबकि 50+ परिसरों पर छापे, संपत्ति attachments और interrogations का काम किया। इसमें टीएमसी के नेता और मंत्री के घर शामिल थे।

लेकिन ED के  निशाने पर मुख्य रूप से  I-PAC (Indian Political Action Committee — टीएमसी 
की चुनावी रणनीति बनाने वाली फर्म रही । ED ने I-PAC के    सह संस्थापक श्री विनेश चंदेल को 13 अप्रैल को ही  गिरफ्तार कर तब तक जेल में रखा जब तक चुनाव खत्म नहीं हो गया।

ED के कई मामलों में समानांतर या सहायक भूमिका में CBI रही।  वैसे CBI ने पुराने मामलों में टीएमसी के नेता और कार्यकर्ता  पर कार्रवाई जारी रखी। 

Income Tax Department भी कहां पीछे रहने वाली थी उसने ममता बनर्जी के प्रपोज़र मिराज शाह पर ही छापा मार दिया।

इसी तरह NIA ने बम बनाने या विस्फोटक हिंसा की आशंका पर निगरानी रखने के नाम पर टीएमसी के कई कार्यकर्ताओं को सम्मन किया और पकड़ा।

ED-NIA-CBI की सक्रियता central forces की भारी तैनाती और ECI के अन्य कदमों (अधिकारियों के तबादले, मतदाता सूची में संशोधन ) के साथ मिलकर टीएमसी के लिए दबाव का माहौल बनाया गया। कलकत्ता हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में इनमें से कुछ मुद्दे उठे पर टीएमसी को नाम मात्र की ही राहत मिली। 

न्यायपालिका और गोदी मीडिया: क्या जनतंत्र के आखिरी स्तंभ भी सिस्टम के साथ हैं?


System की बंगाल में जीत में सुप्रीम कोर्ट का भी बड़ा योगदान रहा या यूं कहें सबसे बड़ा योगदान रहा। क्योंकि देश की संस्थाओं में से सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में ही यह ताकत थी  जो अगर चाहती तो देश में जनतंत्र के पतन को रोक सकती थी पर उसने ऐसा नहीं किया। चाहे वोटिंग मशीन का प्रश्न हो, सीसीटीवी फुटेज दिखाने का हो या फिर मतदान की गड़बड़ी का इसने हमेशा चुनाव आयोग का साथ दिया है।

SIR को ही ले लीजिए यह सुप्रीम कोर्ट में लटका ही हुआ है उधर पूरे देश में SIR हो भी गया।SIR को तो छोड़िए सुप्रीम कोर्ट अभी तक अंतिम रूप से यह निर्णय नहीं कर पाया है कि देश में नागरिकता की जांच करने का अधिकार चुनाव आयोग को है भी या नहीं?

श्री  दुष्यंत दवे (वरिष्ठ वकील और पूर्व सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन अध्यक्ष) PRINT में दिये गए 
इंटरव्यू  10 May, 2024 को ही कह दिया था Today, we are really turning ourselves into an authoritarian state and I would say the judiciary is singularly responsible for that.”

इलेक्शन कमिश्नर की नियुक्ति प्रक्रिया पर किए गए 2023 में किए मुकदमे को सुनने समय 2026 में देना सुप्रीम कोर्ट का चुनावी मामले में लापरवाही का नमूना है। यही कारण है कि इलेक्शन कमीशन केंद्र सरकार के हाथ की कठपुतली बना हुआ है।

इसी तरह चुनाव को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला सिस्टम  के सबसे बड़े हथियार, SIR को जारी रहने देना  सुप्रीम कोर्ट का System को दिया गया तोहफा ही है।  

बिहार SIR, जिसमें मनमाने तरीके से वोटर्स के नाम काटने और जोड़ने का खेल खेला गया था ,मरे हुए को जिंदा और जिंदा को मुर्दा बताया गया था और मतदाता Dog Babu पिता: Kutta Babu, मां: Kutiya Devi जैसे नामों की वोटर लिस्ट बनती थी ऐसे SIR को बंगाल सहित पूरे देश में जारी रहने की हरी झंडी देना जनतंत्र का मजाक नहीं तो क्या है?

यही सुप्रीम कोर्ट है जिसने यह अजीबोगरीब फैसला दिया के जिन वोटर्स के मामले अभी लंबित है वे बंगाल के इस इलेक्शन में वोट नहीं देंगे। 34 लाख वोटर्स (बाद में 27 लाख) की आखिर गलती क्या थी?  कहां गया न्याय का वो सिद्धांत, भले ही सौ दोषी छूट जाएं, पर एक भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए? 

हमको नहीं पता। 
हमको कुछ नहीं पता? ( अरे! गब्बर सिंह?)

बंगाल में सिस्टम की इस जीत में  गोदी मीडिया का योगदान भी कुछ कम नहीं रहा। हिन्दू - मुसलमान का नैरेटिव चलाने के अलावे सिस्टम के लिए 200 पार का समा भी बांधने में  मीडिया लगा रहा।ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि मतगणना के दौरान  उनकी पार्टी कई सीटों पर आगे चल रही थी, लेकिन मीडिया ने अपने रुझानों में उसे नहीं दिखाया।

शुरुआती राउंड में BJP की बढ़त दिखाकर भ्रम फैलाया गया।इसी भ्रम में उत्साहित हो बीजेपी के लोग/उम्मीदवार और फोर्सेस के साथ मतगणना केंद्र में घुसे और उनके काउंटिंग एजेंट्स पर हमला कर उन्हें काउंटिंग सेंटर से बाहर कर दिया ,CCTV कैमरे बंद कर दिए गए और बिना उनके एजेंट के ही शेष काउंटिंग कर 100 से अधिक सीटें लूट ली गई।

जनादेश की चोरी या लोकतंत्र की आधिकारिक विदाई?


यही कारण है कि सुश्री ममता बनर्जी अपनी हार मानने को तैयार नहीं है और न ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया है। उन्होंने बंगाल चुनाव परिणाम को  "जनादेश की चोरी", "लोकतंत्र की हत्या" और System की साजिश बताया। वो  आज भी अपनी और टीएमसी को नैतिक रूप से विजेता मानती है। सुश्री ममता बनर्जी अब कुछ भी माने वास्तविकता ये है System ने एक और चुनाव जीत लिया है और जनतंत्र की पुनः हार हो गई।  

विडम्बना ही तो है कि देश में हर चुनाव के बाद जनतंत्र मजबूत होने की बजाय कमजोर हो रहा है। इस सच्चाई को मानना ही पड़ेगा कि System ने देश की सभी संस्थाओं पर अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली है अब देश में सत्ता परिवर्तन चुनाव के माध्यम से  हो ही नहीं  सकता। यह परिवर्तन होगा भी तो वहीं जिन राज्यों में विपक्ष की सत्ता होगी ? बाकि 
 
सुनो चंपा सुन तारा 
तंत्र जीता जन हारा 
अरे बड़ा मजा आए सुनो भक्तों आज मेरी बात 
नाचो, गाओ, झूमो जरा , मार के ??क्रेसी को लात 
सुनो चंपा सुन तारा,
वो तारा!

जय हिंद

अस्वीकरण :  यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और विश्लेषणात्मक है तथा इसमें किया गया व्यंग्य विषय को सरल और रोचक बनाने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या राष्ट्र की मानहानि करना नहीं है।























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