/* " क्या 'वंदे मातरम्' करेगा सरकार की रक्षा ? ("Will Vande Mataram Shield the Government?")

" क्या 'वंदे मातरम्' करेगा सरकार की रक्षा ? ("Will Vande Mataram Shield the Government?")


Vande Mataram Shield of the Government
सांकेतिक एवं व्यंग्यात्मक चित्रण (Satirical Illustration)

संसद का  2026 का मानसून सत्र काफी हंगामपूर्ण रहा। विपक्ष प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को अपने सवालों के जवाब के लिए ढूंढता रहा पर ये दोनों पूरे सत्र के दौरान लगभग नदारद रहे। इसी बीच राष्ट्रीय गीत "वंदे मातरम्" को लेकर संशोधित कानून ध्वनि मत से पास करा कर विपक्ष के हर सवाल का जवाब भी ढूंढ़  लिया गया। राष्ट्रीय गीत न हुआ मानो सरकार के हाथ राष्ट्रवाद का ट्रंप कार्ड, तुरुप का पत्ता या ताश का पोपुलु लग गया हो ? जिसे जहां और जब चाहा वहां फिट कर दिया। 

यह एक्ट क्या पास हुआ दोनों महानुभावों का संसद में आने का कोई मतलब ही नहीं रहा, ना ही छात्रों पर हुई बर्बरता पर प्रधानमंत्री की माफी और गृहमंत्री की सफाई की जरूरत रही।  इसी के साथ पेपर लीक की जिम्मेदारी, राम मंदिर में चंदा चोरी, बेरोजगारी, मंहगाई या फिर इथेनॉल पेट्रोल से होने वाला नुक्सान सारी समस्याओं का भी मानो समाधान कर लिया गया? चलिये ठीक है विपक्ष को कुछ तो जवाब तो मिला। 

गरचे "गंदम अगर बहम न रसद, भुस* ग़नीमत अस्त"।

उल्लेखनीय है कि वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत को लेकर 2025 के संसद के शीतकालीन सत्र में 1971 के कानून पर बहस हुई थी। इस नवीन सत्र में यह बिना विशेष बहस के पारित कर दिया गया।

Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act, 2026

इस एक्ट के द्वारा 1971 के अधिनियम की पुरानी धारा 3 को  संशोधित कर राष्ट्रीय गान जन गण मन के साथ राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को भी शामिल कर दिया गया है।

“3. राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के गायन को रोकना या उसमें व्यवधान डालना —

जो कोई व्यक्ति जानबूझकर—

(क) राष्ट्रगान (जन गण मन) या राष्ट्रगीत (वंदे मातरम्) के गायन को रोकता है; या

(ख) ऐसे गायन में लगी किसी सभा/जनसमूह में व्यवधान पैदा करता है,

उसे अधिकतम तीन वर्ष तक के कारावास, या जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जाएगा।” 

दुबारा ये अपराध करने पर एक वर्ष की कैद अनिवार्य है।

यहां उल्लेखनीय है कि यह कानून वंदे मातरम को गाना अनिवार्य नहीं बनाता अर्थात् इसको न गाने या चुप रहने पर कोई सजा नहीं है। सिर्फ गाने को रोकने या जानबूझकर व्यवधान पहुंचाने पर सजा का प्रावधान है। 

गृह मंत्रालय का प्रोटोकॉल  दो बनाम छः छंद

यह भी उल्लेखनीय है इस कानून में वन्देमातरम के कितने छंद (दो या छः) गाये जायेंगे इसका कोई जिक्र नहीं है।यह जिक्र गृहमंत्रालय द्वारा जनवरी 2026 में जारी प्रोटोकॉल/ दिशा निर्देश में किया गया। 

 “Orders relating to the National Song of India”

इसमें साफ लिखा गया कि आधिकारिक/सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् का पूरा छह छंदों वाला संस्करण (अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड) गाया या बजाया जाए।

अगर राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों हो रहे हों तो पहले वंदे मातरम् और बाद में जन गण मन।

यहां उल्लेखनीय है कि छः छन्दों को गाने की अनिवार्यता सरकारी प्रोटोकॉल है कानून नहीं । आम आदमी या प्राइवेट संस्थानों में यह बाध्य नहीं है। 

सरकारी आदमी भी यदि सरकारी कार्यक्रमों में अगर इस प्रोटोकॉल का उल्लंघन करता है तो उस पर भी विभागीय  कार्रवाई हो सकती है जेल नहीं। 

जेल सिर्फ यदि कहीं गायन चल रहा हो तो उसे रोकने या उसमें बाधा पहुंचाने पर ही हो सकती है।

कांग्रेस की आपत्ति 

कांग्रेस और विपक्ष की मुख्य आपत्ति कानून  से अधिक गृह मंत्रालय के इस प्रोटोकॉल को लेकर ही है जो कानून के संशोधन की चर्चा के समय ही आया था।

कांग्रेस  1937 के कांग्रेस वर्किंग कमिटी के उस प्रस्ताव को ही उचित मानती है जिसमें वंदे  मातरम् के शुरुआती 2 छंदों को ही राष्ट्रीय गीत माना गया था। कांग्रेस कमिटी  की राय में बाकी के छंदों में हिंदू देवी (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती) के प्रतीक और धार्मिक कल्पना है, जो इस्लाम की एकेश्वरवादी मान्यताओं से टकराती है उसे राष्ट्रीय गीत का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।

वर्किंग कमिटी ने ये राय  नेताजी सुभाष चंद्र बोस ,श्री जवाहरलाल नेहरू और नोबेल पुरस्कार विजेता गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर के बीच आपसी पत्राचार के आधार पर कायम की थी।

कालक्रम से हुए पत्राचार 

16 अक्टूबर 1937 को बोस ने टैगोर को लिखा कि विवाद बढ़ रहा है और CWC बैठक में गीत को पूरी तरह छोड़ने का फैसला हो सकता है। उन्होंने टैगोर से सलाह मांगी क्योंकि टैगोर ने ही 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में गीत गाया था। 17 अक्टूबर 1937 को उन्होंने नेहरू को भी पत्र लिख कर टैगोर से राय लेने को कहा।

20 अक्टूबर 1937 को नेहरू ने बोस  को जवाब देते हुए लिखा कि  वंदे मातरम् में भाषा की कठिनाई भी है, ज्यादातर लोग इसे नहीं समझते। 

जहां तक  हंगामा की बात है वो काफी हद तक साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा बनाया गया है।  इसमें कुछ सच्चाई भी है।

पर हम साम्प्रदायिक भावनाओं को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि वास्तविक शिकायतों को दूर करने के लिए काम करेंगे।”नेहरू ने कहा कि वे टैगोर से चर्चा करेंगे।

19 अक्टूबर 1937 को बोस को और 26 अक्टूबर 1937 को नेहरू को जवाब में  टैगोर ने लिखा उसका सारांश ये था कि वंदे मातरम् के  पहले दो छंदों में मातृभूमि की सुंदरता और उदारता का भाव है, जो मुझे विशेष रूप से भाता है।“इसने अपने आप अलग पहचान और प्रेरणादायी महत्व पहले से हासिल कर लिया है, जिसमें मैं किसी भी संप्रदाय या समुदाय को ठेस पहुँचाने वाली कोई बात नहीं देखता।”

“मैं स्वीकार करता हूँ कि बंकिम की पूरी ‘वंदे मातरम्’ कविता अपने संदर्भ के साथ पढ़ने पर मुस्लिम संवेदनशीलता को ठेस पहुँचाने वाली हो सकती है।”
 
इस तरह टैगोर की सलाह पर ही वंदे मातरम के सिर्फ शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने 1937 में अपनाया था जिसे ही बाद में संविधान सभा ने भी अनुमोदित किया।

ताजा विवाद  

15 अगस्त 2026 को  कांग्रेस मुख्यालय में  झंडातोलन के वक्त वंदे मातरम् गायन के दरम्यान श्रीमती गांधी ने  बुजुर्ग कांग्रेस अध्यक्ष श्री खरगे की खड़े होने में परेशानी को देखते हुए कुर्सी लाने का ऑफर और इशारा किया। इसे ही बीजेपी के नेताओं ने कांग्रेस ने राष्ट्रीय गीत का अपमान और 6 छंदों के गायन रोकने की कोशिश की बता दिया । उल्लेखनीय है कि उस दिन वंदे मातरम् के सभी छन्दों का गायन कांग्रेस मुख्यालय में निर्बाध रूप संपन्न हुआ था।

CWC Meeting (19 august 2026)

परन्तु बीजेपी की उछलकूद को देखते हुए कांग्रेस ने 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) की बैठक में पार्टी ने साफ किया कि उसके कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगेयह फैसला 1937 के CWC प्रस्ताव पर आधारित है, जिसमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना आजाद और रवींद्रनाथ टैगोर आदि नेताओं की उपस्थिति में तय किया गया था।
 

इस प्रस्ताव  से तिलमिलाई बीजेपी इसे राष्ट्रीय गीत और राष्ट्र का अपमान बता रही है। ऐसा लगता है देश में एकमात्र समस्या यही हो! ऐसे में महाकवि संत तुलसीदास के नाम से प्रचलित प्रसिद्ध दोहे की याद अनायास आ जाती हैं -

"तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।

भीलां लूटी गोपियाँ वही अर्जुन वही बाण ।।"

जो लोग स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व वंदे मातरम् गीत के दो छंद गाने से विद्कते थे वही अब वंदे मातरम् गीत के छः छन्दों से चिपकने को तैयार हो गए। वैसे विदकने और चिपकने के पीछे कारण एक ही  रहा है वो है डर। तब अग्रेजों का डर था और अभी जनता के सवालों का डर। 

इस डर के आगे न तो तब जीत हुई थी और ना ही अब हो सकती है। क्योंकि छात्रों की गूंज भी सुनाई  दे रही है और कॉकरोचों के पुनः आने की आहट भी!

जय हिंद।

* "जौ "मूल फारसी कहावत में है।भुस का इस्तेमाल हास्य उत्पन्न करने को किया गया है! मतलब गेहूं न मिले तो भूसे पर ही संतोष कर लेना चाहिये।

अस्वीकरण :  यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और विश्लेषणात्मक है तथा इसमें किया गया व्यंग्य विषय को सरल और रोचक बनाने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या राष्ट्र की मानहानि करना नहीं है।




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