/* सुप्रीम कोर्ट में पेगासस जासूसी केस।(" Pegasus Snooping case in Supreme court.")

सुप्रीम कोर्ट में पेगासस जासूसी केस।(" Pegasus Snooping case in Supreme court.")




: “पेगासस जासूसी मामला | Pegasus Snooping Case”

"अपडेट (30 अप्रैल, 2026): सुप्रीम कोर्ट की जांच और हालिया घटनाक्रमों से जुड़ी नई जानकारी इस पोस्ट के अंत में जोड़ी गई है।"

पुरानी कहावत है कि सब दिन होत न एक समान। ऐसा लगता है कि जनता को अच्छे दिन का स्वप्न दिखा सत्ता हासिल करने वाली सरकार के बुरे दिन सांसद में श्रीमती जया बच्चन के श्राप से पहले आ चले हैं।

बंगाल चुनाव और कोरोना की दूसरी लहर में बुरी तरह से मात खाने वाली सरकार को जहां किसानों से पंगा ले मुंह की खानी पड़ी है वहीं दूसरी तरफ  पेगासस जासूसी कांड पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से सरकार पर जबरदस्त झटके लगने की आशंका भी बलवती हो चली है। इसकी गंभीरता का अंदाज़ा गोदी मीडिया के तिलिस्म में उलझी जनता को भले न हो पर सरकार को है। हादसें हो रहें हैं और आत्माऐं दिवंगत हो रही हैं। 

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और जांच के आदेश

27अक्तूबर 2021 पेगासस जासूसी कांड पर  सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसकी जांच अपनी निगरानी में कराने का निर्णय लिया है। ऐसा कर सुप्रीम कोर्ट ने विदेशों में भारत की और देश में खुद की गिरती छवि को बचाने की कोशिश की है। 

यह फैसला ऐतिहासिक है क्योंकि यह सत्ता की अधिनायकवादी कारगुजारियों पर उस संवैधानिक संस्था(सुप्रीम कोर्ट) का जिस पर मौलिक अधिकारों की रक्षा की अंतिम जिम्मेदारी है  प्रजातांत्रिक हस्तक्षेप है।

यह " मोदी है तो मुमकिन है" की बहुप्रचारित फासीवादी अवधारणा को खंडित करता है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में निजता के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना मुमकिन नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा: "हम सूचना क्रांति के युग में रहते हैं, जहां व्यक्तियों के पूरे जीवन को क्लाउड या डिजिटल डोजियर में संग्रहीत किया जाता है। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि टेक्नोलॉजी  लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए एक उपयोगी उपकरण है, लेकिन उसी समय, इसका उपयोग किसी व्यक्ति के उस पवित्र निजी स्थान को भंग करने के लिए भी किया जा सकता है।" इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। 

नागरिकों की निजता का अधिकार और कानूनी चुनौतियां

उल्लेखनीय है कि भारत में संचार माध्यमों पर निगरानी मुख्य रूप से दो एक्ट द्वारा होती है- एक Telegraph Act 1885 और दूसरा Information and Technology Act 2000। इन दोनों ही एक्ट ने निगरानी के लिए सरकार पर जो सीमाऐं लगा रखे हैं पेगासस सॉफ्टवेयर अपनी प्रकृति से ही उन सीमाओं का उल्लंघन कर जाता है।

भारतीय कानून विशेष परिस्थिति में विशेष लोगों( आतंकवादी) की सिर्फ आदान-प्रदान की गई सूचना की निगरानी का अधिकार देता है न कि फोन में घुसकर उसे हथियार बना उसके निजी जीवन के  समस्त क्रियाकलापों को रिकॉर्ड करने या उसे परिवर्तित कर देने का। 

पेगासस द्वारा यही किया गया है। कई कानूनविदों के अनुसार भारतीय सन्दर्भ में पेगासस सॉफ्टवेयर प्रकृतित: अवैध है आतंकवादियों के खिलाफ उपयोग हुआ है या सरकार के विरोधियों पर ये सवाल तो बाद में आता है। 

सुप्रीम कोर्ट की समिति 

ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के लिए मशहूर रिटायर्ड जस्टिस रवीन्द्रन के नेतृत्व में तीन सदस्यीय जांच कमिटी की नियुक्ति कर दी गई है। पू्र्व  IPS अधिकारी श्री आलोक जोशी और डा० संदीप ओबेरॉय जो अंतर्राष्ट्रीय संगठन के Electro-Technical Commission के अध्यक्ष हैं, इसके अन्य सदस्य हैं। 

इस जांच कमिटी को सहयोग के लिए एक तीन सदस्यीय तकनीक समिति भी सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्त किया है। डा: नवीन कुमार, डा:प्रभाहरन पी और डा: अश्विन  अनिल गुमाश्ते (Professor, IIT, Mumbai) इसके सदस्य हैं। जांच समिति को अपनी रिपोर्ट देने के लिए 8 सप्ताह का समय दिया गया है। 

जांच में बाधाएं 

पेगासस जासूसी कांड की जांच में कई बाधाएं है । इस जांच में इजरायल हो या भारत दोनों ही जांच में नानुकूर  वाली सरकारों से  सहयोग मिलने की संभावना कम ही है। पेगासस बनाने वाली कंपनी NSO भी कुछ भी खास बताने को तैयार नहीं है।

सबका हित इस कांड की लीपापोती करने में ही निहित है। इसके अतिरिक्त समस्या इस रूप में भी है कि पेगासस सॉफ्टवेयर  फोन से खुद को इस तरह गायब कर लेता है जिसे फारेन्सिक जांच में ये पता करना मुश्किल हो जाता है कि ये कभी उस फोन में था भी या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट से उम्मीदें 

इन बाधाओं के बावजूद  सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त यह निपुण समिति पेगासस कांड का रहस्योद्घाटन करने में सफल होगी ऐसी आशा की जा सकती है। क्योंकि इसकी शक्तियों का स्रोत  स्वयं सुप्रीम कोर्ट होने के कारण  सरकार से जरूरी जानकारी लेने में इसे सफलता मिलनी चाहिए।

इसके अलावा यह समिति जरूरत पड़ने पर उन अन्तर्राष्ट्रीय तकनीक लैबों( सिटिजन लैब, एमनेस्टी) से भी मदद ले सकती है जिसने इस कांड का सर्वप्रथम पर्दाफ़ाश किया है। दुनिया के अन्य देशों में चल रही जांच से भी मदद ली जा सकती है।

अब तो सबसे सुरक्षित फोन बनाने वाली कंपनी Apple  ने भी मान लिया है कि पेगासस का इस्तेमाल उसके फोन में किया गया है और इसके लिये उसने स्वयं जांच भी शुरू कर दी है। मदद यहाँ से भी मिल सकती है। 

आज की तारीख में भी पेगासस को लेकर भारत में नित नये खुलासें हो रहे हैं।17 दिसम्बर 2021 के वाशिंगटन पोस्ट में खबर छपा है कि भीमा कोरेगांव केस में बंद  सरकार के आलोचक एक्टिविस्ट रोना विल्सन  के फोन में भी पेगासस का उपयोग किया गया था।

ऐसे हालात में भारतीय प्रजातंत्र पर इस पेगाससी हमले पर सुप्रीम कोर्ट की जांच क्या रहस्योंदघाटन करती है यह जरूरी तो है ही पर उससे भी अधिक प्रजातांत्रिक मूल्यों के लिए उठने वाली हर आवाज को राष्ट्रवाद के लिए खतरा मानने वाली सरकार की प्रतिक्रिया इस पर क्या होती है वो  महत्वपूर्ण है। 

जोर का झटका , हाय जोरों से लगा,लगा। 

लाखों दुखों की होती है, यह वजह, वजह।। 

"2026 में पेगासस मामले की ताज़ा स्थिति"

पर जोर का झटका सरकार को लगने की बजाय उन लोगों के उस विश्वास को लगा जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से लगा रखी थी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जांच में सहयोग न मिलने का रोना रोया और कहा अनधिकृत जासूसी (unauthorized surveillance) अवैध, आपत्तिजनक और privacy व freedom of press का उल्लंघन है। कोर्ट ने सरकार के “limited affidavit” को अपर्याप्त बताया और कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा का नाम लेकर हर बार blanket denial नहीं दिया जा सकता।

पर 27 अक्टूबर 2021 को Pegasus मामले में अंतरिम  फैसला दिया कि कमिटी के जांच रिपोर्ट में 29 फोनों में से 5 में कुछ malware मिला, लेकिन Pegasus होने की पुष्टि नहीं हुई। पेगासस  पर अंतिम फैसला अभी (अप्रैल 2026 ) भी लंबित है। 

पर जो काम भारत के सु्प्रीम कोर्ट से अभी तक नहीं हो सका वो काम अमेरिका में Northern District of California (US District Court) ने कर दिया। इस कोर्ट ने Pegasus बनाने वाली NSO Group के खिलाफ WhatsApp (Meta) की याचिका पर दिसंबर 2024 में NSO को दोषी ठहराया। मई 2025 में जूरी ने $168 मिलियन (लगभग 1400 करोड़ रुपये) क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया।court documents में “Victim Country Count” चार्ट के रूप में पेश किए गए,

NSO पर WhatsApp सर्वर का दुरुपयोग कर Pegasus स्पाईवेयर लगाने का आरोप साबित हुआ। Whats App ने अपनी खुद की जांच के आधार पे कोर्ट में शपथपत्र द्वारा जिन देशों में पेगासस इस्तेमाल की जानकारी दी उसमें भारत का स्थान मेक्सिको (456 ) के बाद केवल दूसरा(100) ही था।

अंत में 

"भाई बत्तूर भाई बत्तूर, अब जाएंगे कितनी दूर"

जय हिंद।

अस्वीकरण: यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और विश्लेषणात्मक है तथा इसमें किया गया व्यंग्य विषय को सरल और रोचक बनाने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या राष्ट्र की मानहानि करना नहीं है।







 


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