 |
| सांकेतिक एवं व्यंग्यात्मक चित्रण (Satirical Illustration) |
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गये और एकबार फिर जनादेश का स्पष्ट संकेत देने वाली विपक्ष की सभा में उमड़ती भीड़ छलावा साबित हुई और जीत मृगमरीचिका! जनता द्वारा खदेड़े गये और गोबर स्नान से पवित्र हुए लोगों ने विधायकी हासिल कर ली। इस तरह बदलाव की बहने वाली बयार सत्तापक्ष की जीत की सूनामी में तब्दील हो गई। एक बार फिर जन पर तंत्र ने जीत हासिल कर ली और जनतंत्र पर विश्वास करने वाला जनमानस हक्का बक्का रह गया।
पक्षपाती चुनाव आयोग ?(Biased Election Commission?)
तंत्र की इस जीत में चुनाव आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इतनी महत्वपूर्ण कि बीजेपी और चुनाव आयोग की मिलीभगत को लेकर जिन्हें रत्ती भर संदेह था वो भी दूर हो गया। अब ये बात अंधभक्त भी समझ चुके हैं पर करें तो क्या करें? जिसमें उनके भगवान् खुश उसमें वे भी खुश!
खुशी खुशी कर दो लोकतंत्र को विदा कि राजा बेटा राज करे!
चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद और चलते चुनाव के बीच महिलाओं, बेरोजगारों और वृध्दों को NDA सरकार द्वारा पैसे बांटने को परमिशन देकर, चुनाव आयोग ने कानून और लोकतंत्र का मजाक कैसे बनाया जाता है ये बतलाया है? क्योंकि ऐसा है ना भाई साहिब, जीविका समूह की महिलाओं को दस हजार रूपये बांटना और चुनाव बाद दो लाख का वादा करना मास्टर स्ट्रोक और चाणक्य नीति नहीं है बल्कि खुलेआम बेईमानी और धूर्तता है।
लाभार्थी योजनाओं का गैरकानूनी इस्तेमाल(Illegal use of beneficiary schemes)
उल्लेखनीय है कि पूर्व में चुनाव आयोग वे विपक्ष की सरकारों को ऐसे उन लाभार्थी योजनाओं को लागू करने से रोका था जिनकी घोषणायें आचार संहिता लागू होने से पूर्व की जा। चुकी थी। क्योंकि कानून में यही कहता है। 2019 में उड़ीसा में किसान योजना, 2023 में तेलांगना में बोनस देने और 2023 में ही राजस्थान सरकार की स्मार्ट फोन योजना को रोका गया था।
यद्यपि एनडीए की सरकारों को यह सुविधा जारी रही थी। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना और मध्यप्रदेश में लाडली बहन योजना को सरकार के लाडले चुनाव आयोग ने जारी रहने दिया था।
जहां तक लाभार्थी बनी 1 लाख 80 हजार जीविका की महिलाओं से चुनाव में ड्यूटी लगाने का सवाल है तो यह चमत्कारी और अभिनव प्रयोग चुनाव आयोग ने बिहार में ही शुरू किया है।
एसआईआर का कमाल(The wonder of SIR)
लेकिन NDA की इस प्रचंड जीत का कारण केवल लाभार्थी योजना को बतलाना आंख में धूल झोंकने के समान है। इस जीत के पीछे सबसे बड़ा योगदान चुनाव आयोग द्वारा हड़बड़ी में किये गए जानबूझकर तमाम तरह की गड़बड़ी से युक्त Special Intensive Revision (SIR ) है। इस टूल ने अकेले एनडीए के लिये बिहार में बहुमत की व्यवस्था कर दी ।
दरअसल श्री राहुल गाँधी ने वोटर लिस्ट से नाम काटने और जोड़ने के जिस खेल को वोट चोरी के खुलासे से उजागर किया था वो बिहार में SIR के नाम पर चुनाव आयोग की सीनाजोरी के रूप में प्रकट हुई। बिहार के पिछले चुनाव में जीतने और हारने वाले पक्ष में लगभग मात्र 12 हजार मतों का ही अंतर था वहां अधिकारिक रूप से लगभग 69 लाख (जनसंख्या के नवीन आंकड़े के हिसाब से 80 लाख ) मतदाताओं के नाम काटे गए और 21 लाख नाम जोड़े गए। ऐसे में परिणाम के लिये कुछ बचता भी है क्या?
केरल कांग्रेस के खुलासे और आरोप(Kerala Congress's revelations and allegations)
केरल कांग्रेस ने 15 नवंबर 2025 को X (@INCKerala)
पर पोस्ट में दावा किया कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में NDA की 202 में से 128 सीटों पर जीत SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के तहत वोटर डिलीशन से हुई है। इन, 128 सीटों पर डिलीट वोटर्स NDA की जीत मार्जिन से अधिक पाए गए ।अर्थात जहां 5,000 वोटर हटाए गए, वहां NDA की जीत 4,000 वोटों से हुई।
अपने पोस्ट में कांग्रेस की केरल इकाई ने आरोप लगाया है कि एसआईआर का काम बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल से आए अवैध प्रवासियों की पहचान करके उन्हें हटाना था। लेकिन चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए पूरे डेटासेट में एक भी अवैध प्रवासी नहीं मिला।
दरअसल, एनडीए के शासनकाल में पीड़ित गरीब और कमज़ोर मतदाताओं को हटाने के लिए एसआईआर के नाम पर बड़े पैमाने पर सफ़ाई अभियान चलाया गया। उन्हें मतदाता सूची से हटाने के बाद, जो बचे थे उन्हें भी वोट देने से रोक दिया गया और फिर पूरी तरह से मनगढ़ंत चुनाव करवाकर चले गए।
केरल कांग्रेस अपने पोस्ट में इन 128 सीटों का सीटवाईज आंकड़ा केरल X पर (@INCKerala ने दिया जिसे यूट्यूब के The News Launcher चैनल पर भी देखा जा सकता है।
यदि ये सच है तो SIR का समर्थन करने वाली एकमात्र पार्टी बीजेपी और उनकें गठबंधन ने सिर्फ 74 सीट जीत कर बहुमत के आंकड़े को 202 पर पहुंचा दिया। अर्थात SIR 128 +एनडीए 74 = विपक्ष का सफाया । यदि SIR की बजाय चुनाव आयोग के ही जनवरी 2025 के अद्यतन मतदाता सूची के आधार पर चुनाव होते तो महागठबंधन की जीत होती?
केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति, अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर ने SIR को राजनैतिक नरसंहार बतलाते हुए बिहार चुनाव परिणाम को लेकर कई आरोप लगाये है ंं।
आंकड़ों की हेराफेरी(Data manipulation)
उनका कहना है कि वोटिंग डेट 6 नवंबर को मतदाताओं की संख्या 7.42 करोड़ बताई गई, जो 11 नवंबर को 7.45 करोड़ हो गई।
इतना ही नहीं मतगणना के दिन कुल वोट पड़े 5,00,29,880 बताए गए, लेकिन गिने गए 5,02,97,553— अतिरिक्त वोटों का रहस्य क्या है ? इस पर सफाई आई कि वैलेट पेपर वाले वोट नहीं जोड़े गए थे। पर क्यों ं किसने मना किया था? वैलेट पेपर की संख्या भी कुल पड़े वोट में दी जाती है यह सफाई नही सफाया है।चुनाव के बीच महिलाओं को ₹10,000 ट्रांसफर (विश्व बैंक फंड का दुरुपयोग?) वोट खरीदने के ही सबूत है ं।
अन्य राज्यों से BJP समर्थक फर्जी वोटरों को बीजेपी द्वारा ट्रेन रिजर्व कर के बिहार लाया गया। सांसद कपिल सिब्बल ने हरियाणा से चलने वाली ऐसी चार ट्रेनों के सबूत भी पेश किये। यहां ये भी उल्लेखनीय है कि SIR की प्रक्रिया में डुप्लीकेट और फर्जी वोटर को मिनटों में पहचान करने वाले Software का इस्तेमाल नहीं किया गया। क्यों?
ऐसे पक्षपाती चुनाव प्रक्रिया में प्रभाकर ने विपक्ष को चुनाव लड़ना ही व्यर्थ बतलाया है।
यह कहा जाता है कि SIR तो सबके लिये है तो विरोध क्यों? इतना ही नहीं ये भी कहा जाता है सभी कटने वाले वोटर बीजेपी के खिलाफ ही वोट देते ऐसा कैसे माना जाय? पहली बात
विरोध इसलिये है कि जिस नाम ( घुसपैठिए) पर जिस तरह से यह किया जा रहा है वो गलत है। सवाल है कि घुसपैठिये भी नहीं मिले नहीं और एक भी नागरिक छूटने भी नहीं चाहिये तो इतने वोटर्स गायब कैसे हो गए ? रही दूसरी बात तो वोट बीजेपी को देते या नहीं देते ये तो तभी पता चलता जब वोट देने देते?
विपक्ष के आरोप हैं कि फर्जी वोटर हटाने के बजाय मर्जी के वोटर हटाने और जोड़ने का काम किया गया तो ऐसे में SIR का मतलब Special Intensive Rigging नहीं तो और क्या है? यह रिगिंग किसके लिये जिससे इसे फायदा पहुंचता है । फायदा किसे पहुंचता है वो केरल कांग्रेस ने बिहार चुनाव आयोग के ही आंकड़े लेकर सिध्द कर दिया है। बिहार में कुल जमा 31 सीटों की बजाय 89 सीट बीजेपी को मिल गई।
विपक्ष की माने तो SIR वोट चोरी का ही संवर्धित संस्करण है इसका समर्थन सिर्फ बीजेपी करती है फायदा भी उसे और उसके गठबंधन को मिलता है। यही कारण है कि श्री राहुल गाँधी के वोट चोरी के आरोंपों की (जवाब तो है खैर है नहीं) सफाई चुनाव आयोग के बजाय बीजेपी देती है। अपनी सफाई में 272 चाटुकारों की फौज द्वारा श्री राहुल गाँधी पर ही मिथ्या सवाल खड़ी करवाती है।
अतएव कोई चाणक्य नीति नहीं है हां अगर कोई
कोई मास्टर स्ट्रोक है तो वो SIR है , यह बिहार चुनाव के परिणाम ने साबित किया है। यह मास्टर स्ट्रोक इतना जबरदस्त है कि इसे देश के 12और राज्यों में भी करवाया जा रहा है। जहां दो साल के बाद चुनाव है वहां भी इसे एक महीने के अन्दर करवाने की जिद है इसके लिये BLO पर दवाब बनाया जा रहा है।
यह जल्दबाजी निश्चित रूप से देश में मध्यावधि चुनाव का संकेत है। समय कम है सिर्फ, 15 महीने क्योंकि यही अवधि सुप्रीम कोर्ट के नये चीफ जस्टिस की है जिनका चुनाव आयोग पर पूरा विश्वास है।
ऐसे में चुनाव आयोग को जो भी करना है कर ले तंत्र को जो भी व्यवस्था करनी हो कर ले। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना है तो लगा लिये जायें इसका उपयुक्त समय यही है। कोई रोकने वाला नहीं है। अगली बार निश्चित रूप से चार सौ पार?
काम के दवाब में कई BLO की आत्म हत्या और मौत की खबर आ रही हैं पर तंत्र पर फर्क नहीं पड़ता। मास्टर स्ट्रोक जारी है क्योंकि इसके लक्ष्य बड़े हैं वो लक्ष्य है लोकतंत्र को ऐसे तंत्र में परिवर्तित करने का जिसे आजकल की भाषा में Elected Autocracy कहा जाता है।
हिटलर के समय में इसे ही Dictatorship कहा जाता था। जो भी व्यक्ति किसी की चूड़ी टाईट करने की खुशफहमी में इसका समर्थन करते हैं वो शायद भूल रहे हैं कि Dictatorship से किसी का भला नहीं होता। ऐसे में लोकतंत्र की रक्षा के लिये एक इस परिवर्तन को रोकना ही होगा। सवाल तो यही है कि इसे रोकेगा कौन?
जय हिंद।
अस्वीकरण : यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और विश्लेषणात्मक है तथा इसमें किया गया व्यंग्य विषय को सरल और रोचक बनाने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या राष्ट्र की मानहानि करना नहीं है।